हमारे गुरु कौन कौन — उर्मिला पाण्डेय उर्मि

गुरु शब्द सुनने में ऐसा लगता है कि गुरु जो शिक्षा देते हैं दीक्षा देते हैं वही गुरु होते हैं।
ऐसा नहीं है प्रथम गुरु मेरी मां है मां ने मुझे जीवन दिया है मुझे अपने रक्त से पूर्ण किया है। माता ही मुझे रिश्ते नाते सभी का परिचय कराती है।हम शैक्षिक गुरु का ऋण उतार सकते हैं लेकिन मातृऋण को कोई नहीं उतार सकता। गुरु का अर्थ होता है बड़ा जो मुझसे उम्र में ज्ञान में बड़ा हो वह गुरु है।
दूसरी गुरु है मेरी पृथ्वी माता जो कभी भी भेद भाव नहीं करती सभी को बराबर खाने के लिए अन्न फल जड़ी बूटियां आदि उत्पन्न करती है वह किसी से भेद भाव नहीं करती। उसके ऊपर हम सब पलते हैं अतः दूसरी गुरु पृथ्वी माता है।
तीसरे गुरु मेरे पिता हैं जिन्होंने मेहनत करके हमें पाला पोसा लालन-पालन किया उंगली थाम कर हमें चलना सिखाया। पिता का बखान करना शब्दों से परे है।
अत: तीसरे गुरु मेरे पिता हैं उन्होंने ही मुझे जीवन दिया।
चौथे गुरु शिक्षक हैं जो मुझे शिक्षा देते हैं अक्षर बृह्म का ज्ञान कराते हैं समाज में उठने बैठने योग्य बनाते हैं।
उनके कारण ही मुझे अच्छे बुरे का ज्ञान हुआ। ऊंचे-ऊंचे पदों पर गुरु के कारण ही पहुंचते हैं गुरु की महिमा को कोई बखान नहीं कर सकता।
पांचवें गुरु मेरे आध्यात्मिक गुरु हैं परबृह्म परमात्मा से मिलाते हैं। उनकी कृपा से हम सब भव सागर से पार होते हैं इस लोक में और परलोक स्वर्ग में भी गुरु हमें डूबने नहीं देता।
मेरे सद्गुरु पकरी बांह नहीं तो मैं बह जाती।
अतः हम सभी को माता पिता पृथ्वी माता गुरु और आध्यात्मिक गुरु सभी का मान सम्मान आदर सत्कार उनकी आज्ञा का पालन करो जिससे उन्नति होगी।
एकलव्य ने तो गुरु को अपने दाएं हाथ अंगूठा ही द्रोणाचार्य के मांगने पर दान में दे दिया था।
जय गुरुदेव
गुरु बिना नहिं ज्ञान है, ज्ञान बिना नहिं मान।
ज्ञान मान जो चाहिए करो गुरू का ध्यान।।
उर्मिला पाण्डेय उर्मि कवयित्री मैनपुरी उत्तर प्रदेश




