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लघुकथा”अधूरी सज़ा” — मंजू शर्मा ‘मनस्विनी’

 

सरोज बहुत ही सुलझे हुए और सरल स्वभाव की औरत थी। दो बेटों की माँ, पति अच्छा कमाता था, पर शराब और ग़लत आदतों का शिकार था। रोज़ नशे में घर आकर चिल्लाना, हंगामा करना और कभी-कभी उस पर हाथ उठाना उसकी आदत बन चुका था।

बच्चों के लिए सरोज सब कुछ सहती रही, मगर भीतर-भीतर घुटती रही। एक दिन उसका धैर्य टूट गया। गुस्से में तमतमाई सरोज ने मिट्टी का तेल डालकर खुद को आग के हवाले कर दिया।

लोग तुरंत उसे अस्पताल ले गए। जलन की असहनीय पीड़ा उसने पूरे एक महीने झेली। लेकिन जिस बदलाव की उम्मीद उसने की थी, वह नहीं हुआ।

अस्पताल से छुट्टी मिलते ही सरोज घर लौटी। लेकिन उसके पति का व्यवहार वैसा ही था—जैसे कुछ घटा ही न हो।

धुँधली आँखों से उसने छत की ओर देखा—
आंँखों में फिर से सैलाब उमड़ आया।
“सज़ा मैंने खुद को दी… और गुनहगार अब भी आज़ाद है।”

मंजू शर्मा ‘मनस्विनी’

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