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पतंगबाजी, — अलका गर्ग, गुरुग्राम

 

हमारे देश में पतंग उड़ाना ज़्यादातर लड़कों और पुरुषों का शौक़ माना जाता है।तीज त्यौहारों पर भी बहुत कम लड़कियों को पतंग उड़ाते हुए देखा जाता है।ज़्यादातर उन्हें चरखी ही पकड़ा दी जाती है।
मुझे भी बचपन से ही रंगबिरंगी पतंग बहुत लुभाती थीं परंतु दो बड़े भाईयों की बहन होने के कारण मुझे पतंग उड़ाने का मौक़ा ही नहीं मिलता था। भाई कहते पतंग उड़ाना आसान नहीं माँझा फँस जाता है, पतंग कट जाती है ऊँगली कट जाती है जैसे अनेकों कारण मुझे बता दिये जाते और मैं चुप हो जाती। कटी फटी पतंगों की मरम्मत और चरखी पकड़ने तक ही मेरी औक़ात थी।मैं उसमें भी बहुत खुश थी और भरसक भाइयों की मदद करती कि शायद कभी खुश हो कर वे मुझे भी पतंग उड़ाने का मौक़ा दें।
शादी के कुछ साल बाद पतिदेव की बदली जमशेदपुर हो गई।वहाँ हमारे किराए के घर में बड़ी सी छत थी।मकान मालिक की तीन लड़कियाँ और दो लड़कों से मेरी अच्छी दोस्ती हो गई।हमउम्र दोस्तों के साथ मैं बहुत खुश थी।एक दिन उन लोगों को छत पर पतंग उड़ाते हुए देख कर मेरा भी पतंगबाज़ी का शौक़ सर उठाने लगा।उन्हें अपनी बचपन की इच्छा बताई तो तुरंत मेरे हाथ में पतंग दे कर वे उसको उड़ाने के गुर समझाने लगे जो कि मुझे बहुत आसान लगे।
मैंने हाथ में पतंग ले कर ऊँचे उछालते हुए इतनी ज़ोर से हवा में छोड़ी कि मेरे नाखून उसमें घुस गये और फट गई।बहुत शर्म आई पर उन्होंने दूसरी पतंग दे दी।
अबकी बार तेज़ हवा के कारण पतंग के साथ मैं खिंचती हुई मुँडेर तक पहुँच गई।समझ नहीं आया इतनी सी पतंग पैराशूट कैसे बन गई।मुझे तेज़ी से मुँडेर की ओर बढ़ते हुए देख कर सभी की साँस अटक गई।
हताश हो कर साथियों से मदद की उम्मीद में मैं जैसे ही पीछे मुड़ी तो ढील खाया माँझा हवा के वेग से मुझसे ही बुरी तरह लिपट गया और उधर तो और भी ग़ज़ब…मेरी आधा सफ़र तय की हुई पतंग भी कट गई।मतलब मैं पहली ही परीक्षा में चारों खाने चित्त।
वाक़ई पतंगबाज़ी आसान काम नहीं।डोर,पतंग,पवन,ढील,पेंच सभी का सही तारतम्य ही पतंग को उन्मुक्त आकाश में उड़ा सकता है।
पतंगबाजी का यही गुण हमें जिंदगी में भी रिश्तों में सामंजस्य बनाये रखने की सीख देता है।

अलका गर्ग, गुरुग्राम

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