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हसरत (लघुकथा) — राजेन्द्र परिहार सैनिक

 

दीनू एक गरीब हरवाहा था। जायदाद के नाम पर एक टूटी फूटी झौपड़ी थी जो उसे विरासत में मिली थी। कहते हैं कि गरीबी और बीमारी की मित्रता चिरकाल से चली आ रही है। पिताजी ने लंबी बीमारी के बाद हार कर दम तोड़ दिया और इधर पत्नी को भी असाध्य बीमारी ने अपने चंगुल में ले लिया। दीनू के एक लड़का था, जिस पर उसकी आशाएं टिकी हुई थी। वो अपने पुत्र को यथा संभव पढ़ा लिखाकर कोई अच्छी नौकरी दिलवाना चाहता था। दीनू दिन भर जमींदार के खेतों में काम करता। बेटे को पढ़ते देखकर उसे बहुत खुशी होती।उसकी एक मात्र यही #हसरत थी कि बेटा ही उसका नाम रोशन कर सकता है। बेटा जैसे जैसे पढ़ाई में आगे बढ़ता गया। पढ़ाई का खर्च भी उतना ही बढ़ता गया! लेकिन दीनू ने हार नहीं मानी और दूनी मेहनत
से काम करने लगा। उसकी मेहनत से खुश होकर जमींदार ने उसकी पगार भी बढ़ा दी। बेटा रोहित भी मां बाप को सुखी देखना चाहता था। पढ़ाई के साथ साथ नौकरी के फार्म भी भरता रहता। आख़िर उसकी मेहनत और कोशिश रंग लाई और पटवारी के पद पर उसकी नियुक्ति हो गई। सबसे ज़्यादा खुशी दीनू को हो रही थी। कुछ समय बाद रोहित को सरकारी क्वार्टर मिल गया। आर्थिक स्थिति बेहतर हुई तो मां-बाप को
साथ रखकर अपनी मां का इलाज करवाने लगा। आज दीनू की एक मात्र हसरत पूरी हो चुकी थी।

राजेन्द्र परिहार सैनिक

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