मेरा हसीन सपना — अलका गर्ग, गुरुग्राम

मुझे बचपन से ही लिखने का शौक़ था।हमेशा ही पढ़ने से ज़्यादा लिखती रहती थी।स्लेट,कापी जो भी मिलता लिखती।मेरी नानीजी की प्रेरणा से सुंदर अक्षर बनाने की कोशिश करके लिखती।
उम्र के साथ मेरा लिखने का शौक़ भी बढ़ता गया अब मैं छोटी कवितायें,कहानियाँ लिखने लगी।बड़ी कक्षा में पढ़ाई का बोझ अधिक होने के कारण घर में डाँट पड़ने के डर से लिख कर छुपा कर रखती जाती थी।मेरा लिखा हुआ काफ़ी कुछ लिखा हुआ जमा हो गया था।लगता घर वाले बोलेंगे ये क्या बकवास लिखती रहती है।पढ़ती लिखती तो है नहीं।
तत्कालीन महान कवियों के सम्मेलन और महान लेखक उपन्यासकारों की पुस्तकें पढ़ कर बहुत ख़ुशी होती और मैं हसीन सपने देखने लगती …काश कभी मेरी भी रचनायें छपें..मेरा भी नाम हो। मुझे भी लोग पहचानें।
स्कूल की वार्षिक पत्रिका में डरते डरते कविता छपने को दी ,छप गई तो नीचे लिखा अपना नाम देख कर मैं ख़ुशी से पागल हो गई।फिर कॉलेज की पत्रिका में छपने को दी।वहाँ छपने पर घर में दिखाई तो मम्मी पापा बहुत खुश हुए और मुझे प्रोत्साहित भी किए।
विवाह के बाद मेरी सासू माँ ने मेरे लेखन को बहुत प्रोत्साहन दिया।उन्होंने ही ज़िद करके मुझसे रचनायें लिखवा कर राँची (तत्कालीन बिहार) के तीनों समाचार पत्रों की साप्ताहिक पत्रिका में स्वयं भेजीं।और जब समाचारपत्रों में मेरे नाम और तस्वीर के साथ मेरी कवितायें छपी तो उस दिन तो मेरे पाँव ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे।उसके बाद से एक न एक अख़बार के रविवारीय में मेरी रचनाएँ बराबर छपने लगीं।
फिर तो मुझे पीछे मुड़ कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी।
मेरी प्यारी सासू माँ के सहयोग से उस दिन मेरा हसीन सपना वास्तव में पूरा हो गया था।उसके बाद तो मेरे कदम आगे बढ़ते गए।विभिन्न समाचार पत्रों,पत्रिकाओं में लगातार कवितायें,लेख,कहानियाँ अक्सर
छपने लगीं और थोड़ी बहुत पहचान भी बनने लगी।कई मंचों से जुड़ी।बहुत से सम्मान और कई साँझा संकलन भी छपे।ऑन लाइन काव्य गोष्ठियों में भी अक्सर शामिल होने लगी।स्कूल,क्लब और सोसाईटीस के जलसों में भी काव्यपाठ के लिये बुलाया जाने लगा।
कुल मिला कर मेरा अपनी छोटी सी पहचान बनाने का जो हसीन सपना था, माँ शारदा के आशीर्वाद से वह पूरा हुआ।
अलका गर्ग, गुरुग्राम




