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प्यारा बचपन — सुनीता तिवारी

 

बचपन जीवन का वह मधुर अध्याय है जिसकी याद आते ही मन अनायास ही मुस्कुरा उठता है।
न किसी चिंता का बोझ, न किसी जिम्मेदारी की दीवार
बस हंसी, खेल और कल्पनाओं से भरा एक खुला आकाश।
मिट्टी में खेलते हुए समय कैसे पंख लगाकर उड़ जाता था, पता ही नहीं चलता था।
छोटी-छोटी खुशियों में बड़ा सुकून मिलता था
किसी खिलौने का मिल जाना, दोस्तों की टोली का साथ मिलना या फिर माँ की डांट में छुपा हुआ अपार स्नेह।

सुबह स्कूल की तैयारियों में भाग-दौड़, रास्ते में दोस्तों का इंतजार, टिफ़िन में रखी माँ के हाथ की परांठों
की खुशबू
सब कुछ आज भी यादों में ताज़ा है। शाम होते ही गली में जमा होकर खेलना, हार-जीत की फिक्र
किए बिना बस खेलते चले जाना,
मानो दुनिया में और कोई काम ही न हो।

बचपन में सपने भी सरल होते थे
और खुशियां भी।
किसी नई पेंसिल का मिल जाना, बारिश में भीगकर कागज़ की नाव चलाना, पतंग के पीछे
भागना या दादी-नानी की कहानियों में खो जाना
सब कुछ इतना सहज, इतना सुंदर कि आज भी दिल को छू जाता है।

समय आगे बढ़ता गया, जिम्मेदारियाँ बढ़ीं और बचपन की वह निश्छलता धीरे-धीरे धुंध में खोती चली गई।
पर यादें आज भी वैसी ही चमकती हैं, जैसे कभी धूप में चमकते कंचे।
सच में, बचपन एक खजाना है मासूमियत का, आनंद का और उन अनमोल पलों का जिन्हें जीवन में दोबारा नहीं जीया जा सकता, बस महसूस किया जा सकता है।

सुनीता तिवारी

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