रिवाज — अलका गर्ग

पहले समय में बड़ा सुंदर रिवाज़ था घर के हर छोटे बड़े पीतल काँसे और स्टील के बर्तन पर नाम लिखवाने का।नन्ही सी छैनी और हथौड़ी सी लिखने वाले की कलाकारी देखते ही बनती थी।
अंजू की शादी में भी स्टील पीतल और कांसे के काफ़ी बर्तन दिये गये थे।सभी पर उसका नाम लिखा हुआ था।उनकी सास ने सारे बर्तन घर के स्टोर में रखवा दिये थे।अपनी शादी के बाद अंजू ने वे बर्तन फिर कभी नहीं देखे।पाँच साल बाद अंजू को ननद की शादी हुई तो उन्होंने उसको बिना बताये अपनी बेटी की शादी में वे सारे बर्तन और भी शादी में मिला हुआ बहुत सा सामान अपनी बेटी को दे दिया।अंजू सास की बहुत इज़्ज़त और प्यार करती थी।उनकी हर बात में सहमति जताती थी।उसे तो पता भी नहीं था कि उसको बिना बताए घर में यह सब हो रहा है।
उसकी वस्तुयें उसको बिना बताए बेटी को देना उसके साथ बहुत बड़ा छलावा था।घर में इस बारे में बात होने पर अंजू और राकेश कभी भी आपत्ति नहीं करते बल्कि और भी अपने पास से बहुत कुछ देने का आग्रह करते।
शादी से कुछ दिन पहले सास ने अंजू को बैंक चल कर लॉकर खोलने को कहा।बोलीं चलो तुमको बता दूँ कि किस मौक़े पर कौन सा ज़ेवर पहनना है। इकलौती बहू हो अच्छी तरह से सजना तो हमारी भी इज़्ज़त बढ़ेगी।लॉकर खोलते ही सास ने झट से एक सोने की गिन्नी और राकेश की एक अंगूठी सामान में से उठा ली और बोली जल्दी करो डिंपी रो रही होगी।कुछ भी पहन लेना तुम तो सब कुछ पहन कर सुंदर लगती हो।
अंजू बेचारी कुछ समझ नहीं सकी।
शादी में वर को दरवाज़े पर अंजू की सोने की गिन्नी दे दी गई और अंगूठी वर को एक अन्य रिवाज़ में दे दी गई।अंजू अपनी बेटी और शादी के काम,मेहमान सम्भालने में लगी थी।इस बारे में उससे और उसके पति से कुछ पूछा या बताया भी नहीं गया।उसके साथ इतना बड़ा छलावा हुआ है उसे इस बात की भनक भी नहीं थी।
तीन चार साल बाद उनकी ननद ने बताया कि एक दिन उनकी सास ने पूछा तुम्हारे घर में अंजू किसका नाम है ??
तो उसने बताया मेरी भाभी का… उस को कुछ समझ नहीं आया कि क्यों पूछा।दरअसल उन्होंने बर्तनों पर अंजू का नाम लिखा हुआ देख लिया था और वे सब मामला समझ गईं थीं।उसकी ननद की सास ने भी वे सारे बर्तन उसी साल होने वाली अपनी बेटी की शादी में यह कह कर दे दिये कि जब तुम्हारी माँ तुम्हारी भाभी का सामान तुम्हें दे सकती है तो तुम भी तो भाभी हो तुम भी दे सकती हो।और यही रिवाज भी है।
तब उसकी ननद को भी अपनी भाभी के साथ हुए छल और उसके दुख का अंदाज़ा हुआ।
परंतु यह कैसा रिवाज है कि एक बच्ची के घर से मिला सामान जो कि उसके माता पिता ने न जाने कितने बरसों में अपनी बिटिया के लिए जोड़ा हो, ना जाने कहाँ कहाँ से मंगवा कर,कितनी मेहनत करके अपनी लाडली की पसंद नापसंद की वस्तुएं इकट्ठी की हों उनको बिना पूछे,बिना सहमति एक झटके में उठा कर दे देना क्या समाज का ग़लत रिवाज नहीं है …??
हाँ अगर परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है तो फिर भी ये बात सही है लेकिन बहू बेटे की सहमति के साथ।
अलका गर्ग, गुरुग्राम




