लघुकथा, गीता — सपना बबेले स्वरा
गीता को जब भी घर के काम से फुर्सत मिलती वह आ जाती अपने घर के पास वाले खेतों पर।
अपनी किताब लेकर शांति से अपनी पढ़ाई करती।
शादी को दो साल हो हुए थे। सूखा पड़ गया था बूंद पानी नहीं बरसा था दो साल से।
घर का हाल बुरा था सब आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे।
और इस पड़ोस की औरतें उसको अपशगुनी मान रही थी,आपस में बातें करते हुए कहती कि देखो जबसे गीता घर में आई,कितनी गरीबी आ गई है घर बर्बाद हो गया।
गीता मन ही मन दुखी हो जाती पर किसी से कुछ भी नहीं कहती।
वह इंटर मीडिएट उत्तीर्ण थी।
पूरे गांव की बहुओं में सबसे ज्यादा पढ़ी लिखी।
आंगन बाड़ी में जगह निकली ,तो गीता ने पति से इजाजत लेकर फार्म भर दिया। परीक्षा की तिथि आने तक घर में किसी को भी नहीं बताया।
परीक्षा देने जाना था तो अपनी सास से बोली मां जी मैं नौकरी करना चाहती हूं, मैंने फार्म भर दिया आज परीक्षा देने जाना है।
अपने गांव में ही मेरी नौकरी लग सकती है अगर मैं पास हो गई तो।
मां जी बोली बेटा बिना पढ़े कोई परीक्षा में पास कैसे हो सकता।
मां मैं तो रोज पढ़ती थी रोज शाम को खेत पर जाकर।
सास भी सुनकर दंग रह गयी, बोली बेटा सारा काम करने के बाद तूने मेहनत की, भगवान तुम्हारी मेहनत जरूर सफल करेंगे।
दही और शक्कर खिलाकर बहू को परीक्षा देने भेज दिया।पेपर अच्छा हुआ, पंद्रह दिन बाद रिजल्ट आया, गीता पास हो गई।
गाव की आंगनबाड़ी केंद्र में कार्यकत्री के पद पर नियुक्ति हो गई।
गांव वाले सब देखते रह गए,जो बुराई करते थे,वही लोग गीता की सराहना करने लगे। और गांव की महिलाओं के लिए गीता प्रेरणा स्रोत बन गई। कहते हैं ना, जहां चाह वहां राह।
सपना बबेले स्वरा




