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संक्षिप्त लेख : अच्छे व्यवहार  — पालजीभाई वी राठोड़ ‘प्रेम’ (सुरेन्द्रनगर-गुजरात)

 

एक बात तो है जीवन में अपने भूतकाल के लिए कितना भी दुःखी हो लो पश्चाताप कर लो आप बदल नहीं सकते ना ही अत्यधिक चिन्ता करके परेशान होकर आप भविष्य बदल सकते हो आपके हाथ में है वर्तमान बस आत्मविश्वास के साथ अच्छे व्यवहार के साथ आगे बढ़ते रहो सब अपने आप सही हो जायेगा। वाणी और वीणा में एक समानता है दोनों मधुर हों तो अच्छे लगते है वाणी मधुर हो वीणा की तरह तो जीवन में संगीत होगा और अगर बाण बन गई तो महाभारत लड़ाई होगी। मंजिल उन्हीं को मिलती है जो अपने पैरों पर चलते हैं इरादों में जान हो आत्मविश्वास हो जो दूसरों के पैरों पर चलकर मंजिल पाना चाहते हैं वो कभी मंजिल को नहीं पाते या पहुंचते दुःख और पश्चाताप हमें घेर लेता है।चिन्ता चिता समान होती है ये पूरी तरह से समय की बर्बादी है।इससे कुछ भी बदलता नही है तन मन से शिथिल करती है। ख़ुशी के लिए काम करोगे तो ख़ुशी नहीं मिलेगी मगर खुश होकर काम करोगे तो ख़ुशी जरूर मिलेगी। हमारा सुख खुशियां सब छीन लेती है और हमें व्यर्थ ही व्यस्त रखती है।उलझन सुलझाने में लगे है।अपनो को गिराने में लगे हैं लोग रिश्तो के लिए समय कहां है उनके पास नई नई चाले चलने लगे है लोग।जीवन जीने की कला जिसे आती है सुगम ज़िदगा नी उसकी हो जाती है। सबको खुशियां बांटते चले हम साथी तब ही तो यह ज़िन्दगी मुस्कुराती है।जीवन में कभी ऐसा काम मत करना कि अपनी और भगवान की नजरों में गिर जाओ लोगों की चिन्ता मत करना ये तो जरुरत के हिसाब से नजरों पर बिठायेंगे और गिरा भी देंगें।प्रसन्न वही है जिस ने अपना मूल्यांकन किया परेशान वही है जिस ने दूसरों का मूल्यांकन किया।जीवन सुन्दर, सफल, आनंददायी ऐसे ही नहीं बनता उसके लिए ह्रदय में प्रेम खुशी दया क्षमा धैर्य त्याग अनुग्रह आदि को ह्रदय में व्यवहार में रखना पड़ता है। प्रकृति ही ईश्वर है विज्ञान सत्य है इंसानियत ही धर्म है कर्म ही पूजा है और मानवता श्रेष्ठ धर्म है।

“सोच सरल पावन रहे सुंदर सहज स्वभाव,
कुटिल प्रदूषित भावना सुख का पादुर्भाव।”

श्री पालजीभाई वी राठोड़ ‘प्रेम’
(सुरेन्द्रनगर-गुजरात)

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