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विछोह से विश्वास तक, जीवन के स्थानांतरणों की आत्मकथा — मंजु शर्मा ‘मनस्विनी’

 

शब्द छोटा है, पर हर किसी के जीवन में यह कुछ न कुछ अनुभव ज़रूर छोड़ जाता है। मेरे तो जीवन की शुरुआत ही स्थानांतरण से हुई थी। जिस दिन मेरा जन्म हुआ, उसी दिन मम्मी को एक गहरी बीमारी ने घेर लिया। पैदा होते ही माँ से दूर… जीवन का पहला स्थानांतरण — कैसा अनुभव था, नहीं जानती, पर शायद उसी दिन से ‘विछोह’ मेरे जीवन का हिस्सा बन गया।

दूसरा स्थानांतरण था…गाँव से शहर का।
हरियाणा से रांची आना, मैट्रिक के बाद पापा के साथ।
नया शहर, नए लोग, नई भाषा… सब कुछ बदल गया था।
पापा ने कॉलेज में दाख़िला तो करा दिया, लेकिन मैं किसी को नहीं जानती थी। इसी वजह से चुप-चुप रहने लगी।
बहुत मुश्किल थे वो दिन — हर चेहरा अजनबी, हर आवाज़ परायी लगती थी।

फिर आया तीसरा स्थानांतरण —सिर्फ जगह नहीं, जीवन का भी। साल था 1994, दिन 20 फरवरी। एक नए बंधन, एक नए रिश्ते के साथ…एक ऐसे इंसान के साथ जिसे मैं बिल्कुल नहीं जानती थी। बस पापा की दहलीज पार की, यह सोचकर कि उन्होंने जिसे चुना है,वो मेरे लिए निश्चित ही अच्छा होगा।

पर उस दहलीज को पार करते वक्त मन में हज़ारों सवाल थे।
कैसे लोग होंगे? कैसा परिवार होगा?
क्या मैं सबके साथ ख़ुद को ढाल पाऊँगी?
संयुक्त परिवार…नया घर, नए लोग, और मैं — एक अनजान दुनिया में सहमी-सी,बुत बनी एक मासूम-सी बच्ची… मौन का दुशाला ओढें, नींद से लथपथ, उनके साथ चल पड़ी। अजनबियों के शहर…सबकी कही हर बात, हर रीति-रिवाज निभाती चली गई।

अगले दिन पगफेरे की रस्म थी। पापा-मम्मी से मिलने होटल में गई। दादी माँ और बाऊजी, मम्मी-पापा और घर के सभी लोगों का उदासी लिए, स्नेह से भरा चेहरा देख मन पिघल गया। सबकी आंखें डबडबाई हुई। जैसे पता नहीं क्या छूट रहा हो।
उस पल पहली बार महसूस किया…
अपने कलेजे के टुकड़े को विदा करने का दर्द कैसा होता है।

बेटी को छोड़कर उन सबको लौटना था…
इस सिहरन से मन फूट-फूटकर रोया, घर के लोगों का भी यही हाल था। मन में एक उलझन थी।
मात्र 18 साल की लड़की सोच रही थी,कैसे रहेगी अजनबी लोगों के बीच? सबने बहुत समझाया, और मैं लौट आई अपनी नई ज़िंदगी में। जैसे-जैसे कदम आगे बढ़े, धड़कनें भी बढ़ती गईं। मेरे हमसफ़र शायद मेरी उलझन समझ गए थे।
उन्होंने मेरा हाथ थामा और कहा…घबराओ नहीं…
आज से मैं हर वक्त तुम्हारे साथ हूँ। हम एक-दूसरे को जानते नहीं हैं,इसलिए यह रिश्ता आज बस ‘ज़रूरत’ भर लगता है,
पर समय के साथ यही रिश्ता ‘प्रेम’ का एहसास बन जाएगा।”

इनकी बातों ने मन को बड़ी राहत दी।
और मैं चल पड़ी एक नए सफ़र की ओर, विश्वास के साथ।

दिन, महीने, साल गुजरते गए। कभी प्रेम बेमिसाल था, तो कभी तकरार ने भी बीच में स्थान लिया। यही इस रिश्ते की सार्थकता रही। जहाँ रूठना भी है, और मनाना भी।
वो रिश्ता ही क्या जिसमें तकरार और तड़प न हो।
इस स्थानांतरण के सफर में “मैं कच्ची मिट्टी-सी खुद को घड़े की तरह परिपक्व करती रही”। जिंदगी के इन 33 सालों ने बहुत कुछ सिखाया रोज एक नया अनुभव…बेटी से पत्नी, बहु, चाची,भाभी और माँ बनने का एक सुखद अहसास….समझ ही नहीं आया कैसे गुजर गया ये वक्त, घरके लोगों ने बहुत प्यार दिया…और शायद इसी प्रेम ने जीवन का सफ़र आसान बना दिया।

आज बच्चे भी बड़े हो गए। जैसे जिंदगी ने एक पड़ाव पूर्ण
कर लिया हो। वैसे इस सफ़र को शब्दों में बयां करना आसान नहीं है लेकिन कुल मिलाकर सफर बहुत अच्छा रहा। आज कोई अजनबी नहीं है । सब मेरे दिल के बहुत करीब है।

बस यही रहा– मेरे जीवन के स्थानांतरण का अनुभव।

गुजरे वक्त ने खूब अनुभव दिए,
कभी आँधियाँ आईं, कभी धूप खिली,
कभी बादल बरसे, कभी बरसात हुई,
पर मैंने हर परिस्थिति में ख़ुद को गढ़ा।

मंजु शर्मा ‘मनस्विनी’

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