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आलेख — भारतीय समाज का जटिल यथार्थ,योगदान,सत्ता और उपेक्षा  – कविता साव पश्चिम बंगाल

 

भारतीय समाज में बार-बार यह प्रश्न उठता है कि क्या सवर्ण वर्ग का योगदान सबसे बड़ा रहा है। इस प्रश्न का उत्तर केवल “हाँ” या “न” में नहीं दिया जा सकता, क्योंकि योगदान के साथ-साथ यह भी देखना आवश्यक है कि सत्ता, संसाधन और अवसर किसके हाथ में रहे और किससे छीने गए।

इतिहास में सवर्ण वर्ग को शिक्षा, शास्त्र और शासन तक अपेक्षाकृत अधिक पहुँच प्राप्त थी। इसी कारण वे नीति-निर्माता, आचार्य और सत्ता के केंद्र में रहे। यह योगदान महत्त्वपूर्ण है, पर यह भी सच है कि इसी विशेषाधिकार ने सामाजिक असमानता को स्थायी रूप दिया। ऊँचे पदों पर पहुँचने के बाद भी वंचित वर्गों को समान अवसर नहीं मिले।

गुरु द्रोणाचार्य इसका सबसे मार्मिक उदाहरण हैं। वे श्रेष्ठ आचार्य थे, धनुर्विद्या के महान ज्ञाता। उन्होंने अर्जुन जैसे शिष्य को गढ़ा, परंतु एकलव्य—जिसने बिना गुरु के, बिना संसाधन के, केवल साधना से स्वयं को सिद्ध किया—उसे उन्होंने शिष्य के अधिकार से वंचित रखा। गुरु दक्षिणा में अंगूठा माँगना केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं था, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था का प्रतीक था, जिसमें ज्ञान पर अधिकार जन्म से तय होता था, योग्यता से नहीं।
यहाँ योगदान और अन्याय साथ-साथ खड़े दिखाई देते हैं।
इसी तरह दलित साहित्य की प्रसिद्ध कहानी “ठाकुर का कुआँ” सामाजिक सत्ता का यथार्थ चित्र प्रस्तुत करती है। कुआँ जीवन का आधार है, पर वह केवल ठाकुर का है। प्यास सबको लगती है, पर पानी सबके लिए नहीं। यह कहानी बताती है कि संसाधनों पर अधिकार श्रम या आवश्यकता से नहीं, बल्कि जाति से तय था। यह उपेक्षा सदियों तक सामाजिक ढाँचे का हिस्सा बनी रही।

इतिहास का एक और उदाहरण है चाणक्य और चंद्रगुप्त मौर्य। चाणक्य उच्च वर्ग और उच्च शिक्षा-परंपरा से आए थे। उन्होंने चंद्रगुप्त को सत्ता में स्थापित किया—आंशिक रूप से अपने स्वार्थ और अपमान के प्रतिशोध में। चंद्रगुप्त उनके लिए सत्ता परिवर्तन का साधन बने।
फिर भी, यह तथ्य महत्त्वपूर्ण है कि चंद्रगुप्त कोई परंपरागत सवर्ण राजा नहीं थे। इस निर्णय ने यह दिखाया कि सत्ता-नीति कभी-कभी वर्ण-आधारित व्यवस्था को तोड़ भी सकती है, हालाँकि उसका उद्देश्य सामाजिक समानता नहीं, बल्कि राजनीतिक स्थिरता था।

इन सभी उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि समस्या योगदान की नहीं, बल्कि योगदान के लाभों के एकाधिकार की है। वंचित वर्गों—दलित, पिछड़े, आदिवासी और स्त्रियाँ—ने कृषि, श्रम, शिल्प, लोकसंस्कृति और समाज की निरंतरता में मूलभूत योगदान दिया, पर उन्हें न तो श्रेय मिला, न निर्णय-प्रक्रिया में स्थान।
आधुनिक भारत में संविधान और आरक्षण जैसी व्यवस्थाएँ इसी ऐतिहासिक असंतुलन को सुधारने का प्रयास हैं। आज प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि किस वर्ग का योगदान बड़ा था, बल्कि यह कि क्या अब भी ज्ञान, संसाधन और सत्ता सबके लिए समान रूप से उपलब्ध हैं।
निष्कर्षतः, भारतीय समाज किसी एक वर्ग की देन नहीं है। यह सहयोग, संघर्ष और विरोध से बनी साझा विरासत है। सच्चा योगदान वही है जो ज्ञान को सीमित न करे, जो एकलव्य का अंगूठा न माँगे, जो ठाकुर के कुएँ को सार्वजनिक बनाए—और सत्ता को जन्मसिद्ध अधिकार नहीं, सामाजिक उत्तरदायित्व ।
कविता साव
पश्चिम बंगाल

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