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अगर मैं होता पतंग — राजेश कुमार ‘राज’

 

अगर मैं होता पतंग
तो गिरता अपनी नानी के घर पर
देखता खंडहर हो गये निर्जन घर
उनमें खोजता नानी की गोद की गर्माहट को
सुनता हवा में नानी की पदचापों को
जिनके पीछे नापा करता था पगडंडियों को
जाता नाना की चौपाल पर भी
महसूस करता ऊष्मा बुझे अलाव की
और आवाज़ हुक्के की गुड़गुड़ाहट की।

अगर मैं होता पतंग
तो गिरता अपनी बड़ी बहन के घर पर
उसके झुर्रियों भरे चेहरे में खोजता अपने बचपन
हमारे मीठे लड़ाई-झगड़े और समर्पण
महसूस करता उसके मंद-मंद स्पंदन
भाई दूज का उल्लास और रक्षा के बंधन।

अगर मैं होता पतंग
तो गिरता अपने भाई के घर पर
ढ़ूंढता अपने दिवंगत भाई के स्नेहिल आलिंगन
खबर लेता उसके तितर-बितर हो गये परिवार की
लेता ख़ैर-ख़बर कहीं खो गये अपने भतीजे की
वक़्त की मिट्टी में दफ़न हो गये रिश्तों की।

अगर मैं होता पतंग
तो गिरता अपने पैतृक घर पर
खोजता अपना बचपन
दादा-दादी चाचा-चाची का दुलार
माॅं के अंक में साॅंसों की गर्मी
पिता का क्रोध और आंखों की नर्मी
बचपन के यार-दोस्त और पेड़ों के झुरमुट
काग़ज़ की नांव और नदी नालों की कल-कल
संकरी सुनसान गलियों के जमघट
जिनमें कभी गूंजती थीं हमारी किलकारियाॅं
और जिनमें दफ़न हो चुकी हैं ढेरों कहानियाॅं।

अगर मैं होता पतंग
तो गिरता किसी ग़रीब की झोंपड़ी पर
झाॅंकता उसकी खाली हंडिया में
राशन विहीन कनस्तर और डिब्बों में
फटेहाल माॅं-बाप और बच्चों में
खुश होता जब वें बच्चे मुझे लूटते
खिलखिलाते मन अपना बहलाते।

अगर मैं होता पतंग
तो गिरता किसी सत्ताधीश के घर पर
उसे बताता हाल देश का,
ग़रीबी के परिवेश का
भ्रष्टाचार और बेईमानी का
अरावली पर मनमानी का
युवाओं की बेरोज़गारी का
वृद्धों की लाचारी का
युवतियों के भंग होते शील का
रेपिस्टों को मिलते पैरोल-बेल का।

है मेरा दुर्भाग्य कि मैं पतंग नहीं हूॅं,
उड़कर विचर नहीं सकता गगन असीमित में,
पर मन है जो भटकता रहता है स्मृतियों के वन में,
जैसे कटी पतंग भटकती है अवनी-अम्बर में।

© राजेश कुमार ‘राज’

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