अहोभाग्य — कविता साव पश्चिम बंगाल

वह वर्षों से ज्यों-त्यों तप कर रही थी — कच्ची धूप में भीगते संध्यान, जले हुए दीपों की मद्धम हरकत, और मौन में गुँथी हुई इच्छा। उसके प्रयत्नों का स्वर था साधना, पर हर साँस में लिपटी रही एक ही मुराद: वही मुख, वही हँसी — उसका कृष्ण। वर्षों की तपस्या ने उसके भीतर कुछ बदल दिया था; हृदय अब अधिक विशाल, आकांक्षा अब अधिक निर्मल थी।
फिर एक दिन, जैसे दीपक की लौ हवा के सही स्पर्श पर पूर्ण स्थिर हो जाए, उसका प्यार आया। न अचानक परिचय की रौनक में, न कोई नाटकीय प्रत्यय में — पर उस मौजूदगी में सब कुछ ठहर गया। उसने देखा कि वह कृष्ण—वह मुस्कान, वह वाणी—वह सब उसका था, पर पूरा भी न था। उस मुस्कान का एक कोना पहले से किसी और के नाम जुड़ा था; रुख़्मिणी का नाम उसकी आँखों में धुंधला पर सच्चा था।
आँखों की भाषा ने, बिना शब्द कहे, उसे बता दिया कि प्रेम का स्वरूप कई तरह का होता है। उसके प्रेम ने स्वयं में पूर्णता पाई तो क्या कमी थी? उसने अपने भीतर के उस तर्क को नहीं हथियाया जो कहता—“तुझे पाना ही सफलता है।” न, उसके लिए सफलता किसी धारणा में नहीं थी; वह चाहती थी कि जो उसे मिला है, वह खुश रहे — भले ही वह खुशी किसी और की बाँहों में समाई हो। राधा की तरह नहीं टूटने की कला उसने सीखी थी: निंदा नहीं, न हठ; केवल एक मौन, व्यापक स्वीकार।
उसने रुक्मिणी को अपना न मानकर भी, रुक्मिणी के लिए प्रसन्नता की कामना की; अपने कृष्ण का हाथ किसी और की हथेली में देखकर, वह न केवल दुखमय हुई, बल्कि किसी तरह दिव्य प्रसन्नता का अनुभव भी करने लगी। यह प्रसन्नता राधा के त्याग सी थी — आत्मा की वह महान उदारता जो जानती है कि सच्चा प्रेम अपने व अपने प्रेमी दोनों में स्वतंत्रता चाहता है। उसकी देन आत्मा की वह शांति थी जो किसी रूप में स्वयं को स्वीकार कर लेती है।
फिर भी, उम्मीद की एक महीन डोर उसके हृदय में बनी रही—नाभि से निकलती कोई अनकही आस कि कृष्ण का प्यार, जो कभी उसके लिए तपकर मूर्त हुआ, उसे पूर्णतः छोड़ कर न जाएगा। यह आस किसी संगीतमय विश्वास सी थी: कि प्रेम का सत्त्व उन बाँहों के पार भी पहुँचता है जहाँ नाम भिन्न हों, कि कृष्ण की दृष्टि का एक कोना हमेशा वहीं टिका रहेगा जहाँ उसने प्रेम के फूल खिला दिए थे।
अंततः वह जान गई—अहोभाग्य वही है जब कोई रचना (तपस्या) अपने फल से अत्यन्त परिपूर्ण होकर भी उदारता दिखा दे। उसका हृदय न केवल पाया बल्कि पाया हुआ बाँट भी दिया; और बाँटते समय उसे एक अजीब-सी पूर्ति मिली, जिसे शब्दों में बाँधा नहीं जा सकता। उसके भीतर की वह तप-आग ठंडी पड़ गई, और भी जलते हुए प्रेम की राख में एक मीठी लाली रह गई—यही उसका अहोभाग्य था।
कविता साव
पश्चिम बंगाल



