धारा 17A: भ्रष्टाचार के विरुद्ध क़ानून या भ्रष्टाचारियों की ढाल? — शिक्षाविद् एवं अधिवक्ता: दीपक शर्मा

पिछले वर्षों में यदि भारत में भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष को सबसे अधिक किसी एक कानूनी प्रावधान ने क्षति पहुँचाई है, तो वह है भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 में जोड़ी गई धारा 17A। यह धारा बाहर से देखने में “ईमानदार अधिकारियों की सुरक्षा” का आवरण ओढ़े हुए थी, किंतु व्यवहार में इसने बड़े और प्रभावशाली भ्रष्टाचारियों के लिए एक अभेद्य कवच का काम किया।
धारा 17A का मूल प्रावधान यह है कि यदि कोई लोक सेवक अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान कोई निर्णय लेता है, और उस निर्णय पर भ्रष्टाचार का आरोप लगता है, तो ACB या CBI जैसी जाँच एजेंसियाँ सरकार की पूर्व अनुमति के बिना जाँच प्रारंभ नहीं कर सकतीं। यहीं से समस्या जन्म लेती है। इसका जीवन्त उदाहरण है SMS हॉस्पिटल जयपुर के डॉक्टर मनीष अग्रवाल का भ्रष्टाचार से जुड़ा मामला योंकि जब आरोपी स्वयं सत्ता-तंत्र का हिस्सा हो, तब उसी सत्ता से अनुमति की अपेक्षा करना, न्याय के सिद्धांतों का उपहास है।
“भय का वातावरण” कैसे बना?
इस प्रावधान के लागू होने के बाद देश भर में एक विचित्र स्थिति पैदा हुई।
एक ओर ईमानदार अधिकारी जाँच एजेंसियों से मुक्त नहीं हुए, क्योंकि उन्हें पहले भी संरक्षण प्राप्त था;
दूसरी ओर बड़े पदों पर बैठे भ्रष्ट लोग लगभग अछूत हो गए।
सरकार की अनुमति — जो अक्सर वर्षों तक लंबित रहती है या जानबूझकर रोकी जाती है — ने जाँच को ही पंगु बना दिया।
यही कारण है कि कहा जा सकता है कि इस धारा ने पूरे देश में भ्रष्टाचारियों का आतंक स्थापित किया।
संसद और “मौन सहमति”
यह दुर्भाग्यपूर्ण सत्य है कि भ्रष्टाचार के प्रश्न पर सत्ता और विपक्ष, दोनों अक्सर एक ही पंक्ति में खड़े दिखाई देते हैं। धारा 17A इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: आशा की किरण
अब यह विषय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष है। हालिया कार्यवाही में यह तथ्य सामने आया है कि धारा 17A संविधान के मूल ढाँचे, विशेषकर “क़ानून के समक्ष समानता” और “स्वतंत्र जाँच” के सिद्धांतों के विपरीत है।
यद्यपि अंतिम निर्णय अभी शेष है, परंतु न्यायालय की टिप्पणियाँ यह संकेत देती हैं कि यह संशोधन गंभीर संवैधानिक संदेह के घेरे में है।
यदि यह धारा अवैध या असंवैधानिक घोषित होती है, तो यह केवल एक कानूनी निर्णय नहीं होगा, बल्कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष में एक ऐतिहासिक मोड़ होगा।
असली प्रश्न: किसे संरक्षण चाहिए?
यह प्रश्न आज देश के हर जागरूक नागरिक को स्वयं से पूछना चाहिए:
• क्या संरक्षण ईमानदार अधिकारी को चाहिए या
• उस व्यक्ति को, जिसने पद का दुरुपयोग कर सार्वजनिक धन को लूटा?
ईमानदार अधिकारी को संरक्षण पहले से ही न्यायालयों, सेवा नियमों और संवैधानिक मूल्यों से प्राप्त है।
लेकिन भ्रष्ट अधिकारी को जाँच से पहले अनुमति का कवच देना, लोकतंत्र की आत्मा के साथ विश्वासघात है।
धारा 17A ने यह स्पष्ट कर दिया है कि क़ानून यदि गलत नीयत से बनाया जाए, तो वह न्याय का साधन नहीं, अन्याय का औज़ार बन जाता है। अब समय आ गया है ।
सुप्रीम कोर्ट से देश को यह अपेक्षा है कि वह न केवल इस संशोधन की संवैधानिकता पर निर्णय दे, बल्कि यह भी स्पष्ट करे कि भारत में भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई में क़ानून किसके साथ खड़ा है — जनता के या भ्रष्टाचारियों के।
— दीपक शर्मा
(शिक्षाविद् एवं अधिवक्ता)



