होनहार बालक — डॉ मीरा कनौजिया काव्यांशी

मोहन गरीब घर का,, होनहार, बालक था।
पिता गांव में खेती-बाड़ी, परिवार में चार बच्चे।
मोहन ने लक्ष्य निर्धारित किया ,कि मैं शहर जाकर पढ़ाई करूंगा और एक अच्छी नौकरी प्राप्त करके परिवार के सदस्यों को जीवन जीने का अच्छा स्त्तर प्रदान करूंगा। मोहन के पिता के मना करने के बाद भी, एक दिन चुपचाप से, मोहन रामू काका को बताकर ,गांव से शहर में पढ़ाई और जीविका का साधन जुटाने हेतु कर्म पथ की ओर आगे बढ़ा।
अब क्या था ? मोहन दिन में कॉलेज जाता , उसके बाद शाम को पांच घंटे एक मिल में नौकरी करता । फिर देर रात तक पढ़ता, थोड़ा ही सो पाता था। संघर्ष बढ़ता गया। मोहन ने एम. एस. सी .उत्तीर्ण कर लिया। मिल मालिक ने कहा, कि मैं एक अच्छी कंपनी वाले अफसर की सिफारिश से क्लास वन मैनेजर की नौकरी दिलवा दूंगा। सिफारिश के द्वारा, मोहन को यह गवारा ना हुआ, यह उसके आत्मसम्मान के विरुद्ध था।
मोहन ने अखबार में इश्तहार देखा,नौकरी हेतु तुरंत दिल्ली पहुंच गया। रिटर्न टेस्ट एवं, इंटरव्यू
दोनों परीक्षा में अव्वल नंबर से उत्तीर्ण हुआ। फिर क्या था ?दिल्ली की सुपर पावर कंपनी का मुख्य प्रबंधक चयन कर लिया गया। मोहन का स्वप्न पूरा हुआ और परिवार खुश हुआ।
डॉ मीरा कनौजिया काव्यांशी




