लघु कथा: ईमानदारी का फल — श्री पालजीभाई वी राठोड ‘प्रेम’ (सुरेंद्रनगर-गुजरात)

छोटा सा गांव में रामूभाई एक प्राथमिक शाला में मध्यान भोजन योजना के संचालक थे। स्कूल के बच्चों को बहुत अच्छा खाना बनाकर खिलाते थे।मध्यान भोजन योजना का कमरा,बर्तन,पानी आदि स्वच्छ रखते थे।जो रसोई के लिए चीजे आती वो बच्चों के लिए ही उपयोग में लेते थे।रामूभाई ईमानदारी से फर्ज निभाते थे। उनके कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी के कारण स्कूल के शिक्षक गण, बच्चे गांव के लोगों में बहुत लोकप्रिय बन गए थे। एक बार स्कूल में जांच करने हेतु अधिकारी आया।अधिकारी ने देखा तो बहुत खुश हुए।
रामूभाई को बुलाकर कहा;’आप मध्यान भोजन योजना में ऑर्गनाइजर है।’ रामूभाई ने बड़ी विनम्रता से कहा ;’जी सर,मैं यहां संचालक हूं।अधिकारी ने कहा; ‘रामूभाई, मैंने मध्यान भोजन केंद्र की चीज वस्तुएं बर्तन सभी देखा आप बहुत अच्छे से साफ सुथरा और व्यवस्थित रखते हो।’
रसोई भी मैंने चक्खी। बहुत अच्छी और स्वादिष्ट बनी हुई है। क्या हर रोज ऐसी रसोई बनती है? रामूभाई ने हंसकर उतर दिया;’सर,बच्चों ही मेरे लिए भगवान है।बच्चों को अच्छा खाना खिलाना मेरी फर्ज मैं आता है। मेरा कर्तव्य भी है। वो मेरी फर्ज में अच्छी तरह निभाता हूं। सर,मैं ऐसा मानता हूं कि मेहनत की कमाई ही खाना चाहिए।बच्चों के लिए आए गेहूं, चावल, तेल कभी घर पे नहीं ले जाता हूं।
रामूभाई की बात सुनकर अधिकारी बहुत प्रसन्न हुए और उसने सोचा ऐसा ईमानदार व्यक्ति,कर्तव्य निष्ठ व्यक्ति बहुत कम मिलते हैं।अपनी कचेरी में रामूभाई को प्यून की नौकरी दिला दी। रामूभाई का तो खुशी का ठिकाना ना रहा। गांव में से रामूभाई शहर में रहने के लिए गया।ऑफिस में भी रामूभाई वक्त के पहले पहुंच जाता था। ऑफिस की सारी चीज वस्तु की सफाई,पानी भरना,कंपाउंड में जो फूल छोड़ थे उसको पानी पिलाना सब काम फटाफट कर देते थे। सब कर्मचारी भी
रामूभाई से खुश थे। रामूभाई के दो बेटे थे।शहर में अच्छी पढ़ाई की और ऊंचे पद की नौकरी भी मिल गई।आज रामूभाई निवृत हो गए हैं मगर उनके बेटे को देखकर निरांत की सांस ले रहे हैं।जो अच्छी तरह फर्ज निभाते हैं वो बाद में सुखी होते हैं।उसके बेटा बेटी वेलसेट हो जाते हैं। परिवार में भी सुख शांति बनी रहती है।उसको आत्म संतोष, मान सम्मान मिलता है। कर्म का फल तो मिलता ही है। जैसा कर्म करोगे वैसा ही पाओगे।
” ईमानदारी और कर्तव्य निष्ठा से मिलते अच्छे ही परिणाम,
मिलता है मान सम्मान और होता जग में नाम।”
श्री पालजीभाई वी राठोड ‘प्रेम’
(सुरेंद्रनगर-गुजरात)




