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UGC, जातिवाद और अंधेर नगरी का नया संस्करण — कविता साव पश्चिम बंगाल

 

संविधान की प्रस्तावना आज भी बड़े गर्व से कहती है—
“हम भारत के लोग, सभी को समता का अधिकार देते हैं।”
पर सवाल यह है कि यह “सभी” आजकल किन-किन तक सीमित रह गया है?
UGC के गलियारों में आजकल योग्यता नहीं, जाति का बायोडाटा ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है। मेरिट खड़ी है लाइन में, हाथ में फाइल लिए—और अंदर कुर्सियों पर आरक्षण की मुहर लगी हुई है। जो पूछे, वह “संविधान विरोधी”; जो चुप रहे, वही देशभक्त।
यह वही देश है जहाँ कभी कहा गया था—
योग्यता ही पहचान होगी।
अब कहा जा रहा है—
पहचान ही योग्यता होगी।
यही तो अंधेर नगरी चौपट राजा का आधुनिक संस्करण है—
जहाँ
टके शेर भाजी, टके शेर खाजा,
और योग्यता मुफ्त में दर्शन करने आती है।
प्रधानमंत्री जी बार-बार “सबका साथ, सबका विकास” कहते हैं।
पर UGC की फाइलें पलटकर देखिए—
“सब” में कोई अदृश्य कटौती हो गई है।
कुछ वर्ग विकास की एक्सप्रेस में हैं,
और कुछ प्लेटफॉर्म पर खड़े यह सोच रहे हैं—
“ट्रेन हमारी थी, टिकट भी हमारा,
फिर डिब्बे में चढ़ने से रोका क्यों गया?”
यह तर्क दिया जाता है कि ऐतिहासिक अन्याय की भरपाई हो रही है।
ठीक है।
लेकिन सवाल यह है कि—
क्या आज पैदा हुए छात्र भी
सौ साल पुराने अपराधों की सजा भोगें?
UGC की नीतियाँ अब शिक्षा नहीं,
सामाजिक प्रयोगशाला बन चुकी हैं।
जहाँ मेरिट को माइक्रोस्कोप में रखकर
जाति की स्लाइड चढ़ाई जाती है।
जो सवाल उठाए—वह “समाज तोड़ने वाला”।
जो ताली बजाए—वह “प्रगतिशील”।
और जो पिसता रहे—
वह बस सवर्ण कहलाता है,
मानो यह कोई अपराध हो।
समता का अधिकार काग़ज़ में सुरक्षित है,
पर व्यवहार में पासवर्ड से लॉक हो चुका है।
पासवर्ड है—जाति।
लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति तब आती है
जब अन्याय को नीति,
और चुप्पी को राष्ट्रधर्म बना दिया जाए।
आज प्रश्न UGC का नहीं है,
प्रश्न यह है—
क्या संविधान केवल पढ़ने की चीज़ रह गया है?
या लागू करने की भी कोई मजबूरी बाकी है?
अगर यही व्यवस्था है,
तो फिर कबीर की पंक्ति बदलनी पड़ेगी—
जाति न पूछो साधु की,
अब पूछो—
डिग्री मिलेगी या नहीं, पहले जाति बताओ जी।
कविता साव
पश्चिम बंगाल

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