वो परीक्षा के दिन — प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या”

वो परीक्षा के दिन…
अजीब से दिन थे। सुबह अलार्म से पहले आँख खुल जाती थी, जैसे समय खुद जगा रहा हो। किताब तकिए के नीचे से निकलती, पन्नों पर उँगलियों के निशान और मन पर अनगिनत सवाल। चाय की पहली घूँट में ही माँ की आवाज़ होती,“घबराना मत, जो पढ़ा है वही आएगा।” और पापा की वही परिचित सलाह,“समय का ध्यान रखना।”
स्कूल की राह अलग ही लगती थी। बैग हल्का, मन भारी। गेट पर दोस्त मिलते,कोई आख़िरी बार सूत्र दोहरा रहा, कोई हँसी में डर छुपा रहा। घंटी बजते ही दिल की धड़कनें तेज़ हो जातीं। कक्षा में घुसते समय डेस्क जैसे अपनी जगह बदल लेते थे, और घड़ी की सुईयाँ जानबूझकर धीमी चलतीं।
प्रश्नपत्र हाथ में आते ही एक पल को साँस रुक जाती। फिर वही जानी-पहचानी राहत,कुछ सवाल देखे हुए, कुछ नए-नए। पेन चलते-चलते कभी रुकता, कभी उड़ता। बाहर से आती पंखे की आवाज़, खिड़की से झाँकती धूप,सब कुछ यादों में दर्ज हो जाता। बीच-बीच में पानी की बोतल उठाना, और मन ही मन खुद को समझाना,“हो जाएगा।”
पेपर खत्म होते ही जैसे ज़िंदगी लौट आती। बाहर निकलते ही सवालों की बहस, उत्तरों की तुलना, किसी के चेहरे पर मुस्कान तो किसी की आँखों में चिंता। रास्ते में समोसे की खुशबू और आज़ादी की हवा,अद्भुत संगम था।
आज सोचती हूँ तो लगता है, वो परीक्षा के दिन सिर्फ़ इम्तिहान नहीं थे। वे धैर्य, दोस्ती, भरोसे और खुद पर यक़ीन की परीक्षा के दिन थे। नंबर कब आए, कौन-सा ग्रेड मिला,सब धुंधला हो गया। पर वो सुबहें, वो डर, वो उम्मीद… अब भी साफ़ हैं।
शायद इसलिए, वो दिन आज भी दिल में समाए बैठे हैं,काग़ज़ों से निकलकर, यादों की किताब में।
स्वरचित,मौलिक
प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या”



