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व्यंग्यात्मक लेख -समानता – ललिता भोला जयपुर राजस्थान

 

बात 7-1-2026 की है ! वाक्या देखकर मेरे मन‌ में विचार आया।
हाल ही में हुए एक विशाल कार्यक्रम में मामूली सी कुर्सी को लेकर एक महिला और पुरुष की आपस में झड़प हुई। महिला थोड़ी देर के लिए कुर्सी छोड़ कर कहीं चली गई वापस आई तो एक व्यक्ति ने कुर्सी पर कब्जा कर लिया था। उस महिला ने बहुत समझाया..…भाई साहब मेरी कुर्सी है मैं सुबह से ही इस कुर्सी पर बैठी हूं आप मेरी कुर्सी दे दीजिए कहीं और स्थान ले लीजिए मैं एक महिला हूँ… उस महिला ने याचक स्वर में कहा… परंतु वो पुरूष कुर्सी छोड़ने को तैयार नही था , जमकर बैठे रहे।…जनाब कुर्सी का मामला था … कुर्सी तो कुर्सी है…चाहे ये समारोह की कुर्सी हो या सत्ता की कुर्सी…. जो बैठे कुर्सी उसी की …मैंने भी उस महिला को कहा …आपने कुर्सी नहीं छोड़ना था….! कब्जा रखना चाहिए था ताकि कोई व्यक्ति विशेष समय का तकाजा देखकर हथिया न ले । समानता का दौर है आजकल ! ! कुर्सी पर महिलाओं की संख्या ज्यादा है , ऐसे में भला वो कुर्सी कैसे छोड़ सकता था। याचिका महिला है , इससे उन्हें कोई फर्क नही पड़ता है! स्त्री शक्ति कमजोर नही है वर्तमान में उसे अच्छे से पता है… महिला और महिला सशक्तिकरण का !!

मैने भी मन ही मन में कहा ….बैठे रहिए जनाब …जब तक जनता स्वयं उठाकर नीचे ना उतार दे ।
ललिता भोला जयपुर राजस्थान

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