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आलेख _ सम्मान के भूखे जन हैं– कविता साव पश्चिम बंगाल

 

मनुष्य केवल रोटी, वस्त्र और आवास से ही संतुष्ट नहीं होता। उसके अस्तित्व की सबसे बड़ी आवश्यकता है—सम्मान। यह सम्मान ही उसे आत्मविश्वास देता है, जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है और उसके व्यक्तित्व को सार्थक बनाता है। आज का समाज भौतिक रूप से समृद्ध अवश्य हो रहा है, परंतु भावनात्मक स्तर पर एक बड़ी कमी स्पष्ट दिखाई देती है—लोग सम्मान के भूखे होते जा रहे हैं।
सम्मान का अर्थ केवल पुरस्कार, पदक या सार्वजनिक प्रशंसा नहीं है। वास्तविक सम्मान वह है जो व्यवहार में झलकता है—बातचीत के लहजे में, दृष्टि की सहजता में और स्वीकार्यता की भावना में। जब किसी की बात ध्यान से सुनी जाती है, उसके विचारों को महत्व दिया जाता है और उसके श्रम की सराहना की जाती है, तब वह स्वयं को मूल्यवान महसूस करता है। किंतु आज की प्रतिस्पर्धी और स्वार्थप्रधान दुनिया में लोग दूसरों को छोटा दिखाकर स्वयं को बड़ा सिद्ध करने की प्रवृत्ति अपनाने लगे हैं। परिणामस्वरूप संबंधों में कटुता और समाज में असंतोष बढ़ रहा है।
सम्मान की भूख का एक कारण यह भी है कि आधुनिक जीवन ने मनुष्य को अकेला कर दिया है। परिवार छोटे हो गए हैं, संवाद सीमित हो गया है और संवेदनाएँ औपचारिकता में बदलती जा रही हैं। ऐसे में व्यक्ति भीतर से स्वीकार्यता चाहता है। वह चाहता है कि कोई उसकी उपस्थिति को पहचाने, उसके प्रयासों की कद्र करे। यदि यह सहज सम्मान नहीं मिलता, तो वह कभी अहंकार के रूप में, कभी क्रोध के रूप में और कभी अवसाद के रूप में प्रकट होता है।
विशेष रूप से युवा वर्ग में यह प्रवृत्ति अधिक देखी जा सकती है। सोशल मीडिया के युग में ‘लाइक्स’ और ‘फॉलोअर्स’ मानो सम्मान का मापदंड बन गए हैं। लोग आभासी प्रशंसा के पीछे भागते हैं, क्योंकि वास्तविक जीवन में उन्हें वह स्वीकार्यता नहीं मिलती जिसकी उन्हें आवश्यकता है। किंतु यह क्षणिक संतोष है, जो स्थायी आत्मसम्मान का विकल्प नहीं बन सकता।
समाधान इसी में है कि हम दूसरों को वह सम्मान दें जिसकी अपेक्षा स्वयं करते हैं। एक मधुर शब्द, एक सच्ची प्रशंसा और एक संवेदनशील व्यवहार किसी के जीवन में नई ऊर्जा भर सकता है। हमें यह समझना होगा कि सम्मान बाँटने से घटता नहीं, बल्कि बढ़ता है।
अंततः कहा जा सकता है कि मनुष्य की वास्तविक भूख सम्मान की है। यदि समाज में पारस्परिक आदर और सहानुभूति का वातावरण बने, तो अनेक मानसिक और सामाजिक समस्याएँ स्वतः समाप्त हो सकती हैं। इसलिए आवश्यक है कि हम केवल सम्मान पाने की चाह न रखें, बल्कि सम्मान देने की संस्कृति को भी अपनाएँ—यही स्वस्थ और सुसंस्कृत समाज की पहचान है।
कविता साव
पश्चिम बंगाल

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