होली — राजेश सिंह हाड़ा की कलम से

जब रंग रह जाएँ और रिश्ते खो जाएँ: “बुरा न मानो होली है ”
लेखक: राजेश सिंह हाड़ा
भारत में त्योहार केवल तिथियाँ नहीं होते, वे समाज की आत्मा का उत्सव होते हैं। होली भी ऐसा ही पर्व है — जो रंगों से अधिक रिश्तों, उल्लास से अधिक अपनत्व और परंपरा से अधिक इंसानियत का प्रतीक रहा है। लेकिन आज एक मौन प्रश्न हमारे सामने खड़ा है , क्या हम होली मना रहे हैं, या केवल उसकी परछाई बची है?
हर वर्ष होली आती है। बाज़ार रंगों से भर जाते हैं, सड़कों पर शोर गूंजता है और सोशल मीडिया तस्वीरों से रंग जाता है — और हम मान लेते हैं कि त्योहार जीवित है।
पर सच तब सामने आता है जब कुछ घरों के दरवाज़े डर से बंद रहते हैं…
जब कोई महिला बाहर निकलने से पहले असहजता महसूस करती है…
जब बुजुर्ग शांति खोजते हैं और प्रकृति हमारे उत्सव का बोझ सहती है।
तब होली हमसे पूछती है —
क्या रंग बढ़े हैं, या संवेदनाएँ कम हो गई हैं?
वह होली जो दिलों में बसती थी,
एक समय था जब फागुन केवल मौसम नहीं, भावना हुआ करता था। ढोलक की थाप, गुझिया की खुशबू और टेसू के फूलों से बने रंग जीवन को उत्सव बना देते थे।
धुलंडी के दिन गुलाल सम्मान का प्रतीक होता था। रंग लगाने से पहले दिल मिलते थे। उस समय होली शरीर पर कम, आत्मा पर अधिक खेली जाती थी।
आज उत्सव बड़ा हुआ है, पर संवेदनाएँ छोटी पड़ती दिख रही हैं। रासायनिक रंग, पानी की बर्बादी, तेज शोर और “बुरा न मानो होली है” के नाम पर मर्यादा की अनदेखी इस पर्व की गरिमा को चुनौती दे रही है।
जब किसी त्योहार से कुछ लोग खुश और कुछ भयभीत हों, तब समाज को आत्ममंथन करना ही चाहिए।
त्योहार नहीं बदलते, इंसान बदलता है
होली आज भी वही है।
होलिका की अग्नि आज भी जलती है।
पर यदि हम उसमें अपने भीतर का अहंकार और असंवेदनशीलता नहीं जलाते, तो वह अग्नि केवल लकड़ी जलाती है, समाज नहीं बदलती।
संस्कृति परंपराओं से नहीं, व्यवहार से जीवित रहती है।
प्राकृतिक रंगों का उपयोग करें
पानी और पर्यावरण की रक्षा करें
बिना सहमति रंग न लगाएँ
पारंपरिक सांस्कृतिक मेल-मिलाप बढ़ाएँ
बच्चों को त्योहार का वास्तविक अर्थ सिखाएँ
छोटे संस्कार ही बड़ी संस्कृति बनाते हैं।
आईए.
इस होली किसी रूठे रिश्ते को मनाइए, किसी अकेले व्यक्ति को याद कीजिए और किसी बुजुर्ग के साथ कुछ पल बिताइए।
क्योंकि रंग खरीदे जा सकते हैं,
लेकिन अपनापन केवल महसूस किया जाता है।
शायद आने वाली पीढ़ियाँ यह याद नहीं रखेंगी कि हमने कितने रंग उड़ाए थे,
लेकिन वे जरूर याद रखेंगी कि हमारे त्योहारों ने उन्हें कितना सम्मान और अपनापन दिया।
आइए इस बार होली ऐसी मनाएँ —
जहाँ कोई डरकर घर में न रहे,
कोई अपमानित महसूस न करे,
और कोई रिश्ता अधूरा न रह जाए।
क्योंकि सच्ची होली वही है —
जो रंग उतर जाने के बाद भी दिलों में बनी रहे।
“होली का रंग पानी से नहीं उतरता,
वह इंसानियत से चढ़ता है —
और सम्मान से ही स्थायी बनता है।”
राजेश सिंह हाड़ा
सामाजिक विषयों, संस्कृति और जन-जागरूकता से जुड़े मुद्दों पर लेखन करते हैं। आपके लेख समाज में सकारात्मक सोच, मानवीय मूल्यों और सांस्कृतिक चेतना को प्रोत्साहित करने पर केंद्रित रहते हैं।
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