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मेरी साहित्यिक यात्रा — उर्मिला पाण्डेय उर्मि मैनपुरी उत्तर प्रदेश।

साहित्य संगीत कला से जिसे रुचि होती है उस पर भगवान की विशेष कृपा होती है। कुछ ऐसा ही मेरे जीवन में भी हुआ लेकिन जो व्यक्ति अपने लक्ष्य पर जाने का निश्चय कर लेता है उसके मार्ग में बहुत बाधाएं भी आतीं हैं लेकिन उसकी लगन उसे लक्ष्य तक पहुंचा देती है। मुझे बचपन से संगीत में साहित्य में बहुत रुचि थी कहीं पर भी कीर्तन बुलावा हो मैं अवश्य जाती थी और कवि सम्मेलन में अवश्य सुनने के लिए अपने पिताजी और भाई के साथ जाती थी।
मेरी लगन थी उसका परिणाम यह हुआ कि मैं गाते गाते स्वयं लिखने लगी। मेरे चाचा कवि थे भागवती पंडित थे कथाएं करते थे कथाएं सुनने में बहुत रुचि थी इसका परिणाम यह हुआ कि मैंने हिंदी संस्कृत से एम ए किया आचार्य किया।
जब मेरे चाचा जी कविता पढ़ते थे तो मेरी भी इच्छा होती थी कि मैं भी मंच पर बैठकर कविता पढ़ूं धीरे धीरे मैं लिखने लगी मैं कक्षा नौ की छात्रा थी उसी समय से लिखने लगी सबसे पहले मैंने देशभक्ति गीत लिखा और अब तो कक्षा दश और कक्षा बारह में पढ़ाते पढ़ाते मैं दोहा चौपाई छंद आदि सभी लिखने लगी। मैं सबसे पहले इटावा नुमाइश में कवि सम्मेलन में गई थी बहुत खुशी हुई आज मैं बहुत बड़े-बड़े मंचों पर पढ़ने लगी ये सब मां शारदे और मेरे गुरुजनों की कृपा है।
उर्मिला पाण्डेय उर्मि मैनपुरी उत्तर प्रदेश।

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