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मर्यादा के दीप-श्रीराम  — डॉ. पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा’ लेखिका एवं कवयित्री बैतूल, मध्यप्रदेश

 

जब-जब समय के अंधकार में दिशायें मौन हो जाती हैं,
जब मनुष्य का मन अपने ही संशयों के वन में भटकने लगता है,
जब इतिहास के विस्तीर्ण आकाश पर एक शांत,
दीप्तिमान छवि उभरती है-
वह छवि है श्री राम की,
जो केवल एक नाम नहीं, अपितु जीवन के उच्चतम आदर्शों का आलोक है।
अयोध्या की सुवासित हवाओं में पला-बढ़ा वह राजकुमार,
जिसकी आँखों मे करुणा का अथाह सागर था,
जिसके ह्रदय में सत्य की अडिग शिला विराजमान थी,
जिसने सुख-सम्पन्न राजसिंहासन को भी सहज भाव से त्याग दिया,
केवल एक वचन की मर्यादा के लिए,
केवल पिता के प्रेम और धर्म की रक्षा के लिए।
वन की नीरवता में, जहाँ वृक्षों की छाया भी तपस्या बन जाती है,
वहाँ श्रीराम ने अपने व्यक्तित्व की दिव्यता को और भी निखारा,
सीता का अटूट स्नेह, लक्ष्मण की अचल निष्ठा-
इन सबके मध्य वह पुरुषोत्तम,
हर परिस्थिति में संतुलन, धैर्य और धर्म का प्रतीक बना रहा।
जब अधर्म का अहंकार रावण के रूप में गरजा,
जब शक्ति ने अपने स्वरूप को अत्याचार में बदल लिया,
तब श्रीराम ने केवल अस्त्र नहीं उठाए,
अपितु धर्म का ध्वज थामकर यह सिद्ध किया-
कि विजय केवल बल की नहीं,
सत्य और नीति की होती है।
उनकी दृष्टि में शत्रु भी केवल एज जीव था,
जिसे पराजित करना आवश्यक था,
परन्तु घृणा करना नहीं,
यही करुणा, यही संतुलन,
उन्हें ईश्वरत्व के शिखर तक ले जाता है।
श्रीराम का जीवन एक विस्तृत महाकाव्य है,
जिसमें हर पंक्ति त्याग की अग्नि में तपकर उज्ज्वल हुई है,
हर शब्द मर्यादा के स्वर्ण से अलंकृत है,
वह केवल अतीत की गाथा नहीं,
वर्तमान की दिशा और भविष्य की प्रेरणा है।
जब मनुष्य अपने कर्तव्यों से विमुख होता है,
जब भी सत्य का मार्ग कठिन प्रतीत होता है
तब श्रीराम कु स्तुति,
एक दीपक बनकर ह्रदय में जल उठती है-
जो कहती है कि
धर्म का पथ भले ही कष्टदायक हो,
परन्तु अंततः वही पथ मोक्ष की ओर ले जाता है।
इसलिए श्रीराम केवल पूजनीय नहीं,
अपितु अनुकरणीय है-
वह आदर्श, जो जीवन को साधारण से असाधारण बना देता है,
वह मर्यादा, जो मनुष्य को मनुष्यत्व का बोध कराती है ।।

डॉ. पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा’
लेखिका एवं कवयित्री
बैतूल, मध्यप्रदेश

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