आलेख: बिकते उपाधि-पदक-सम्मान लेखक: राजेश कुमार ‘राज’

आज ज़माना प्रतिस्पर्धा का है। प्रत्येक व्यक्ति अपने क्षेत्र में आगे निकल जाना चाहता है। छात्र है तो उत्तम मार्क्स और डिग्री-डिप्लोमा, खिलाड़ी है तो पदक-प्रशस्ति और साहित्यकार है तो मंच और सम्मान का अभिलाषी रहता है। चूंकि सफलता आसानी से नहीं मिलती और अगर मिल भी जाए तो उसकी प्रसिद्धि और प्रशंसा का सदैव अभाव रहता है। हर व्यक्ति अपनी आत्मतुष्टि के लिए कोई मंच, कोई उपाधि और सम्मान चाहता है लेकिन यह इतना भी आसान नहीं। पहले से स्थापित प्रतिभाओं के मध्य स्वयं का स्थान बनाना इतना सरल नहीं होता। वांछित और उचित प्रोत्साहन के अभाव में बहुत सी प्रतिभाएं गुमनामी के अंधेरे में खो जाती हैं।
कुछ साहित्यिक मंचों, खेल और शैक्षणिक संस्थाओं ने इस बात को अच्छे से समझ लिया और अप्रत्यक्ष रूप से सम्मान बेचने शुरु कर दिए हैं। ऐसी संस्थाऍं प्रत्यक्ष कीमत या मूल्य नहीं माॅंगती अपितु पंजीकरण शुल्क, सहायता राशि, या स्पोंसरशिप के नाम पर उदीयमान प्रतिभाओं से धन वसूलती हैं और बदले में दोयम दर्जे के साहित्यिक मंचों पर उपस्थिति, लगभग फर्ज़ी सी उपाधियाॅं और पदक आदि बाॅंट देती हैं। आजकल ऐसे प्रकाशकों का भी कुकुरमुत्ते की तरह जन्म हो गया है जो पैसे लेकर उदीयमान प्रतिभाओं के साहित्यिक कार्य को पुस्तक की शक्ल में प्रकाशित करते हैं। यह स्थापित परम्परा के ठीक उलट है। प्रतिष्ठित प्रकाशक समूह निःशुल्क पुस्तक प्रकाशित करता है, उसका प्रचार-प्रसार करता है और लेखक को राॅयल्टी मिले इसकी भी व्यवस्था करता है।
यह सब गोरखधंधा चल पा रहा है क्योंकि प्रतिष्ठित मंच और संस्थाऍं उदीयमान प्रतिभाओं को समुचित प्रोत्साहन नहीं देतीं। जो जम गया वह किसी नये को अपने समकक्ष देखना ही नहीं चाहता। यही कारण है कि उदीयमान प्रतिभाऍं ऐसे जुगाड़ू लोगों के जाल में फॅंस जाती हैं। अंत में यही परामर्श है कि सतत् परिश्रम और सही अवसर की प्रतीक्षा के अतिरिक्त सफलता और सम्मान प्रप्ति का कोई दूसरा मार्ग नहीं है।
© राजेश कुमार ‘राज’
द्वारका, दिल्ली
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