चौखट — कविता साव पश्चिम बंगाल

मंदिर में आज फिर वही थाल सजा था,सिंदूर, दीपक, फूल और एक अधूरी प्रार्थना।
मुक्ति धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ती हुई भीतर आई। उसकी आँखों में इंतज़ार था, और दिल में एक ही नाम,प्रेम।
कभी उसने सोचा था,यह सिंदूर उसके जीवन का साज बनेगा, उसके सपनों की पहचान।
पर आज वही सिंदूर थाल में सजा रह गया, और उसके हाथ… बहुत दूर रह गए।
प्रेम ने वादे तो किए थे, मगर निभा न सका।
शायद दुनिया की शर्तें, रिश्तों की दीवारें, या फिर उसका अपना डर,कुछ तो था जो उसे मुक्ति तक आने नहीं देता था।
लोग कहते थे,“प्यार सब कुछ पा लेता है।”
मुक्ति हर बार मुस्कुरा देती, क्योंकि उसने जाना था,हर प्रेम, मुक्ति नहीं देता।
वह मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ गई। घंटियों की गूंज उसके भीतर की चुप्पी से टकराकर लौट रही थी।
उसने आँखें बंद कीं और पहली बार शिकायत नहीं, एक सवाल किया,
“क्या सच में प्रेम वही है, जो मुझे बाँध दे?”
कुछ पल यूँ ही बीत गए।
फिर जैसे भीतर कोई उत्तर जागा,धीमा, मगर स्पष्ट।
मुक्ति उठी। उसने थाल को देखा, फिर चौखट को छुआ।
इस बार उस स्पर्श में केवल पीड़ा नहीं थी,एक निर्णय भी था।
उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई,
“तुम हँसोगे कहीं… मैं गली नहीं जाऊंगी…”
वह एक क्षण रुकी, फिर धीरे से बोली,
“तेरे चौखट पर आकर… खुद को छली पाऊंगी।”
उस दिन मुक्ति चली गई,
प्रेम से नहीं, बल्कि उस भ्रम से, जिसमें वह खुद को खोती जा रही थी।
उस दिन मुक्ति को सच में मुक्ति मिल गई।
कविता साव
पश्चिम बंगाल




