संक्षिप्त लेख:ओन लाईन खरीददारी का बढ़ता चलन कितना सार्थक — पालजीभाई वी राठोड़ ‘प्रेम’

आजकल विज्ञान और तकनीक ने मानव जीवन को थोड़ा तेज कर दिया है।आज का मानव स्वयं कुछ काम में व्यस्त रहता है इसीलिए ऑनलाइन खरीदारी का बढ़ता चलन एक वरदान है।इससे हमें
घर बैठे वाजिब कीमत पर समान मंगा सकते है। युवा वर्ग में इसका चलन बहुत बढ़ गया है।पहले हम गांव या शहर की दुकानों में जाकर खरीदारी करते थे। दुकानदार कभी कभी हमें उधार भी सामान देते थे।आपस में स्नेह भावना बढ़ती रहती थी। यह स्नेह प्रेम की जगह ऑनलाइन खरीदारी व्यवहारिकता ने ले ली है। कभी कभी दुकान छोटे गले में भी धोखा गिरी होती रहती है। गलत चीज देकर हमें बेवकूफ भी बनाते हैं। जब कि ऑनलाइन खरीदारी में गलत समान मिलने पर वापस भेजने की सुविधा भी है। चीज वस्तु योग्य न होने पर हम बदल सकते हैं। दुकानों में वस्तु की छपी हुई कीमत से ग्राहक के पास ज्यादा पैसे वसूली करते हैं। जबकि ऑनलाइन खरीदारी योग्य दाम लेते हैं।घर बैठे सुविधा प्राप्त होती है।कीमतो और समय की बचत के साथ एक खरीदारी का अनुभव होता है। छोटी व्यवसायिकों को वैश्विक बाजार तक पहुंचने में मदद करता है। अगर हम सब ऑनलाइन खरीदारी में लग जाए तो बाजार में सार्वजनिक स्थानों में भीड ना नजर आए। बिना सोचे समझे हम ऑनलाइन का उपयोग करते हैं तो नुकसानदायक हो सकता है।ऑनलाइन खरीदारी में पैसों की सुरक्षा का भी खतरा रहता है। स्थानिक दुकानदारों को नुकसानी होती है। अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।मेरा मानना है कि ऑनलाइन खरीदारी का बढ़ता चलन इस जमाने में सार्थक है।
श्री पालजीभाई वी राठोड़ ‘प्रेम’
(सुरेंद्रनगर -गुजरात)




