संस्मरण: अनकही बात — लेखक: राजेश कुमार ‘राज’

बात वर्ष 2008 के अप्रैल माह की है। मेरी पत्नी वन्दना देवी दिल्ली के राजीव गांधी कैंसर अस्पताल के आईसीयू वार्ड में अपनी ज़िंदगी की आख़िरी जंग लड़ रही थी। मेरे दोनों बच्चे अभी छोटे थे। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरे शरीर का एक हिस्सा मुझसे कहीं दूर जा रहा है। मैं अपनी पीड़ा किसी को बता नहीं सकता था। छोड़ कर जाती हुई पत्नी के वियोग में खुल कर रो भी नहीं सकता था क्योंकि मेरे रोने से बच्चों का मनोबल टूट जाता। बच्चे भी समझ चुके थे कि उनकी माॅं बस कुछ दिनों की मेहमान है।
वर्ष 2007 में मेरी पत्नी के गर्भाशय के मुख पर दूसरी स्टेज का कैंसर जाॅंच के दौरान पकड़ा गया। आरम्भिक इलाज दिल्ली के सफ़दरजंग अस्पताल में हुआ। तत्पश्चात मेरी पत्नी को इंट्रा कैविटी रडियो थिरैपी की आवश्यकता आन पड़ी। सफ़दरजंग अस्पताल में उस वक़्त इस थिरैपी की मशीन ख़राब थी। अतः मैं अपनी पत्नी को दिल्ली के राजीव गांधी कैसर अस्पताल में आईसीआरटी के लिए ले गया। तब से लेकर उनके अंतिम श्वास भरने तक उनका इलाज़ इसी अस्पताल में चला।
वो काला दिन मुझे आज भी याद है। 17 अप्रैल 2008 की देर शाम अस्पताल ने उनके लिए रक्तदान करने के लिए कहा। परिवार के लोग और मेरे बेटे के सभी मित्र पहले ही रक्तदान कर चुके थे। अतः मैं रक्त की व्यवस्था करने के लिए आस-पास के ब्लड बैंकों के चक्कर काट रहा था। अचानक मेरे मोबाइल की घंटी बजी मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। काॅंपते हाथों से मैंने काल ली। दूसरी तरफ से आईसीयू का गार्ड बोल रहा था। उसने मुझे तुरंत आईसीयू आने के लिए कहा। मैने उसे कहा कि मैं रक्त के प्रबंध में लगा हूॅं। उसने कहा “अब उसकी ज़रूरत नहीं है।” इस वाक्य ने मुझे अंदर तक तोड़ दिया। मेरी पत्नी मुझे और बच्चों को छोड़कर जा चुकी थी। मैं उसके अंतिम क्षणों में उसे बताना चाहता था कि मैं उसे बहुत प्यार करता हूॅं और मुझे एवं बच्चों को उसकी ज़रूरत है। परन्तु वक़्त ने मुझे यह कहने का अवसर ही नहीं दिया और मेरी यह बात मेरे मन में एक अनकही बात बन कर रह गई।
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