अन्नदाता की चिंता : खेत सूने, गांव वीरान — पुष्पा भाटी

संपादक
किसान आज सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। नकली खाद और बीज ने उसकी मेहनत को खोखला कर दिया है। फसलें बार-बार चौपट हो रही हैं और सपने बिखर रहे हैं। हालात इतने भयावह हैं कि कई किसान अपनी जमीन बेचकर आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हैं।जमीन बड़े साहूकारों और कर्ज़दाताओं के शिकंजे में जा रही है। एक ओर किसान कर्ज़ तले दब रहा है, दूसरी ओर उसके हाथ से वे खेत भी छिनते जा रहे हैं, जिन पर पीढ़ियों तक उसने खेती की थी। जब खेत ही छिन जाएंगे तो किसान कहाँ जाएगा? यही कारण है कि लोग गांव छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। यह पलायन केवल किसानों का नहीं, बल्कि गांवों की संस्कृति, परंपरा और आत्मा का पलायन है।यह संकट केवल किसान का निजी दुख नहीं, बल्कि पूरे देश का संकट है। खेती कमजोर होगी तो अन्न उत्पादन घटेगा, खाद्य सुरक्षा पर खतरा बढ़ेगा और भारत की कृषि प्रधान पहचान मिट जाएगी।अब सरकार और समाज दोनों को मिलकर किसान का हाथ थामना होगा। नकली खाद-बीज पर कड़ी रोक लगानी होगी। कर्ज़माफी और ब्याज रहित ऋण जैसी योजनाएँ सख़्ती से लागू करनी होंगी। साहूकारों की मनमानी पर अंकुश जरूरी है। सबसे अहम यह कि किसानों को आत्महत्या की ओर धकेलने वाली नीतियों को बदलना ही होगा।किसान केवल खेतों का नहीं, बल्कि पूरे देश का अन्नदाता है। उसकी पीड़ा को अनदेखा करना राष्ट्र के भविष्य से खिलवाड़ है। यदि किसान हारा तो आने वाले कल में खेत सूने और गांव उजड़े मिलेंगे। केवल गांव नहीं, पूरा भारत उजड़ जाएगा।




