रिश्तों का टूट कर बिखरता बाँध — पल्लवी राजू चौहान

आज के इस आधुनिक युग में मानव अपने मूल्यों और सिद्धांतों को नज़र अंदाज़ कर व्यावहारिकता की जीवन शैली को अपना रहा है। पारिवारिक और सामाजिक मूल्य धरे के धरे रह गए हैं। मानव पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारियों को छोड़कर धन और वैभव की होड़ में जीवन के वास्तविक धरातल विलग होता जा रहा है।
एक वक्त वह था जब परिवार और सामाजिक मूल्यों को प्राथमिकता दी जाती थी। आपसी प्रेम, संयुक्त परिवार के मानदंडों को सर्वोपरि रखा जाता है। घर और समाज कभी भी एक दूसरे से अछूते नहीं होते थे। अधिकतर पारिवारिक समस्याओं को घर में ही सुलझा लिया जाता था, यदि कोई पारिवारिक समस्या घर की दहलीज से बाहर आता, तो उसे सरपंचों द्वारा निपटा लिया जाता। आजकल पारिवारिक मूल्यों में ही सेंध लग चुकी हैं। घर परिवारवाले अपने ही सगे संबंधियों से धोखा करने लगे हैं, अपने ही परिवार के सदस्यों से बातें छिपाई जा रही है। अब रिश्तों में अपनापन और एकता नहीं रहा। एक ही परिवार के भाई बहन एक दूसरे से अलग थलग से होते जा रहे हैं। अब रिश्तों का स्थान, व्यावहारिकता, स्वार्थ और परमार्थ जैसी भावनाओं ने ले लिया है। रिश्ते नाम मात्र के रह गए हैं। रिश्तों का बांध टूट कर पानी की भांति बह चुका है। रिश्तों के स्थान पर स्वार्थ, झूठ, धोखा और अनचाही व्यवस्था ने ले लिया है। यही जीवन का सत्य है। यही आधुनिक युग की सच्चाई है। इस सच्चाई को यदि स्वीकार लेंगे तो जीवन सरलता पूर्वक जीने में आसानी होगी। वक्त के साथ स्वयं को भी बदल दो, ताकि जीवन सरल और सुदृढ़ बन सके।
लेखिका: पल्लवी राजू चौहान




