कर्म में नेकी और ईमानदारी — सुनीता तिवारी

गद्य
जीवन की राहों में सफलता पाने का सबसे सरल, पर सबसे महत्वपूर्ण मंत्र यही है कि कर्म में नेकी और ईमानदारी बनाए रखो। क्योंकि कर्म ही वह बीज है जिससे भाग्य का फल जन्म लेता है।
यदि बीज ही दोषपूर्ण हो तो फल मीठा होने की आशा व्यर्थ है।
मनुष्य प्रायः यह सोचकर अपने आचरण में शॉर्टकट्स ढूँढता है कि शायद किस्मत बिना मेहनत और बिना सच्चाई के भी मुस्कुरा देगी। पर सत्य यह है कि भाग्य कोई बाहर से आने वाला चमत्कार नहीं बल्कि हमारे ही कर्मों का प्रतिबिंब है। जब कार्य में नेकी होती है तो मन स्वच्छ रहता है और जब ईमानदारी होती है तो कदम दृढ़ रहते हैं।
यही स्वच्छ मन और दृढ़ कदम जीवन को सही दिशा देते हैं।
हर परिस्थिति में ईमानदार बने रहना आसान नहीं
पर यही कठिनाई मनुष्य को ऊँचा उठाती है।
जब व्यक्ति अच्छाई और सत्य के मार्ग पर डटा रहता है तो समय भले ही परीक्षा ले पर अंततः वही व्यक्ति विश्वास, सम्मान और सफलता का अधिकारी बनता है।
दुनियाँ की नज़र में भले ही उसे धीमा समझा जाए, पर वह नींव मजबूत कर रहा होता है जिसका परिणाम टिकाऊ और उज्ज्वल होता है।
कर्म में नेकी और ईमानदारी रखने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि व्यक्ति अपने ही अंतर से संतुष्टि पाता है।
उसे किसी दिखावे की आवश्यकता नहीं रहती। और जब उसे भीतर संतोष होता है तो बाहर का संसार भी सहज हो जाता है।
कहा जाता है,
कर्म में नेकी और ईमानदारी,
रखो।
भाग्य उन्हीं के साथ खड़ा होता है जिन्होंने अपने कर्मों से स्वयं को उसका अधिकारी बनाया हो।
सुनीता तिवारी




