साहित्य की हर विधा का आधार — सुनीता तिवारी

साहित्य भावों की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है परंतु भावों की प्रभावशीलता तभी पूर्ण होती है जब लेखन त्रुटि-रहित हो।
शब्द, वाक्य, व्याकरण और वर्तनी की शुद्धता साहित्य की हर विधा
कविता, कहानी, निबंध, नाटक, संस्मरण या आलेख
का मूल आधार है यदि लेखन में त्रुटियाँ हों, तो उत्कृष्ट विचार और गहन भाव भी अपना प्रभाव खो देते हैं।
त्रुटि-रहित लेखन पाठक और लेखक के बीच सेतु का कार्य करता है।
शुद्ध भाषा पाठक को सहजता से रचना से जोड़ती है जबकि अशुद्धियाँ ध्यान भंग करती हैं और अर्थ का अनर्थ
कर देती हैं।
साहित्य केवल भावावेग नहीं, बल्कि अनुशासन भी है और यह अनुशासन भाषा की शुद्धता से आरंभ होता है।
हर साहित्यिक विधा की अपनी संरचना और मर्यादा होती है।
कविता में लय, छंद और शब्द-सौष्ठव का संतुलन आवश्यक है तो गद्य विधाओं में स्पष्टता, प्रवाह और सटीकता
अनिवार्य है।
इन सभी में त्रुटि-रहित लेखन रचना को विश्वसनीयता और गरिमा प्रदान
करता है।
यही कारण है कि संपादन, पुनर्पाठ और संशोधन को साहित्य-सृजन की अनिवार्य प्रक्रिया माना गया है।
आज के डिजिटल युग में लेखन का विस्तार तो हुआ है परंतु भाषा की शुद्धता के प्रति सजगता कम होती जा रही है।
ऐसे समय में त्रुटि-रहित लेखन का महत्व और बढ़ जाता है।
यह न केवल लेखक की भाषा-समझ को दर्शाता है, बल्कि पाठक के प्रति उसके सम्मान को भी प्रकट करता है।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि त्रुटि-रहित लेखन साहित्य की आत्मा को
सुदृढ़ करता है।
यही वह आधार है जिस पर साहित्य की हर विधा टिकती है और कालजयी बनती है। शुद्ध, स्पष्ट और सटीक लेखन ही साहित्य को ऊँचाइयों तक पहुँचाता है।
सुनीता तिवारी




