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गोरा रंग — – नरेश चन्द्र उनियाल, “कमली कुंज”

लघुकथा

बहुत खूबसूर थी वह, बिल्कुल गोरी-चिट्टी, खूबसूरत नैन नक्श। उसका नाम दिव्यांशी था।
वह तब 25 की थी जब उसके माता-पिता उसके लिए योग्य वर की तलाश करने लग गए थे। एक से बढ़कर एक सुयोग्य लड़के मिल भी रहे थे, किंतु दिव्यांशी ने सबको नापसंद कर दिया, कारण कि कोई साँवले रंग का था तो कोई गेहुँवे रंग का… दिव्यांशी को अपनी ही तरह परफेक्ट गौरवर्ण का लड़का चाहिए था।
इस चक्कर में उसने कई अच्छे सुयोग्य लड़के खो दिए थे। आखिरकार तीस वर्ष की उम्र में उसकी शादी बहुत मुश्किल से सुनिश्चित हो सकी थी। लड़का अच्छा कमाने वाला, सुयोग्य, हर तरह से दिव्यांशी का खयाल रखने वाला, किन्तु साँवला ही था।
पर अब दिव्यांशी को इसका फर्क नहीं पड़ता था… वह अच्छे से समझ गई थी कि आदमी सीरत से गोरा होना चाहिए, सूरत की सुंदरता, सूरत का गोरा रंग अस्थायी और क्षणभंगुर होता है। दिव्यांशी अब सुखी जीवन जीने का मूल-मंत्र समझ गई थी।
– नरेश चन्द्र उनियाल,
“कमली कुंज”
देहरादून, उत्तराखण्ड।

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