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कल्पकथा काव्य महाकुंभ होली महोत्सव : पाँच दिवसीय दस सत्रीय साहित्यिक उत्सव का सफल आयोजन। देश विदेश के १५० से अधिक हिदी प्रेमी सृजनकार सम्मानित।

 

प्रभु श्री राधा गोपीनाथ जी महाराज की कृपा से संचालित राष्ट्र प्रथम हिन्दी भाषा सनातन संस्कृति एवं सद साहित्य हेतु कृत संकल्पित कल्पकथा साहित्य संस्था परिवार की संवाद प्रभारी श्रीमती ज्योति राघव सिंह ने बताया कि हिन्दी साहित्य की सेवा एवं सांस्कृतिक चेतना के संवर्धन हेतु समर्पित कल्पकथा साहित्य संस्था परिवार द्वारा आयोजित पाँच दिवसीय दस सत्रीय कल्पकथा काव्य महाकुंभ – होली महोत्सव का भव्य एवं सफल आयोजन हुआ।

यह साहित्यिक आयोजन शनिवार, २८ फरवरी २०२६ से बुधवार, ०४ मार्च २०२६ तक प्रतिदिन दो सत्रों में संपन्न हुआ, जिसमें देश के विविध प्रांतों तथा विदेशों से जुड़े साहित्यकारों एवं सृजनधर्मियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता कर कार्यक्रम को अनुपम गरिमा प्रदान की।

होली के उल्लास, रंग-रस और सांस्कृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण इस काव्य महोत्सव में सृजनकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से केवल फागुनी उमंग का ही नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, मानवीय संवेदना और भारतीय सांस्कृतिक परंपरा की सुरभि का भी मनोहारी प्रस्फुटन किया। विभिन्न सत्रों में मंच संचालन एवं कार्यक्रम संयोजन का उत्तरदायित्व सिवनी मध्यप्रदेश से श्रीमती रेखा अनूप नेमा ‘रचिका’, जबलपुर मप्र से श्रीमती ज्योति प्यासी एवं श्रीमती रजनी कटारे, दतिया मप्र से डॉ. श्रीमती मंजू शकुन खरे, फरीदाबाद हरियाणा से श्रीमती कीर्ति त्यागी, इटावा उत्तरप्रदेश से भगवानदास शर्मा ‘प्रशांत’, बुराड़ी बुराड़ी दिल्ली से श्रीमती भावना भारद्वाज, मेरठ उप्र से डॉ. श्रीमती ऋतु अग्रवाल, प्रयागराज उप्र से कु. वसुन्धरा रजक ‘वसु’ तथा रायगढ़ छत्तीसगढ़ से श्री अमित पंडा ‘अमिट रोशनाई’ ने अत्यंत कुशलता एवं सौम्यता के साथ निभाया।

कार्यक्रम के दसों सत्रों का शुभारंभ कल्पकथा साहित्य संस्था की संस्थापक दीदी श्रीमती राधा श्री शर्मा द्वारा गुरुवंदना, गणेश वंदना एवं सरस्वती वंदना के मंगलाचरण से हुआ। तत्पश्चात देश-विदेश के १५० से अधिक काव्य मनीषियों ने कार्यक्रम अध्यक्षों एवं मुख्य अतिथियों की गरिमामय उपस्थिति में निर्धारित विषयों पर अपनी स्वरचित रचनाओं का प्रभावपूर्ण पाठ कर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। साहित्यिक गरिमा को सम्मान देते हुए प्रत्येक सत्र में सहभागी रचनाकारों को संस्था की ओर से स्मृति-पत्र प्रदान कर अभिनंदित किया गया।

कार्यक्रम के समापन अवसर पर राष्ट्रगीत “वन्दे मातरम्” के सामूहिक गायन के साथ राष्ट्र सेवा में समर्पित परम बलिदानी वीरों को स्मरणोत्सव वर्ष में श्रद्धापूर्वक नमन किया गया। कार्यक्रम के अंत में कल्पकथा परिवार की ओर से पवनेश मिश्र ने सभी विद्वान अतिथियों, संचालकों, प्रतिभागियों तथा श्रोताओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए आभार प्रदर्शन किया।

प्रत्येक सत्र का समापन वैदिक शांति मंत्र “सर्वे भवन्तु सुखिनः” के उच्चारण के साथ किया गया, जिससे वातावरण में आध्यात्मिक शांति और मंगलभाव की अनुभूति हुई। इस सफल साहित्यिक आयोजन ने यह सिद्ध कर दिया कि जब सृजनशीलता, संस्कृति और समाज चेतना का संगम होता है, तब साहित्य केवल शब्दों का उत्सव नहीं रह जाता, बल्कि वह लोकमंगल और मानवीय एकता का महापर्व बन जाता है।

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