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आजमा कर छोड़ दिया — सरिता चौहान

 

बार-बार आजमाया तूने मेरे वजन को
वजन हल्का है या भारी है।
मेरी वजह तसल्ली ना हुई तो तूने पलड़े पर रख दिया।
वजन भारी निकला
तूने आजमा कर छोड़ दिया।
बार-बार आजमाया तूने मेरे वजूद को।
की क्या ही इसका वजूद है।
यह तो एक स्त्री है जो कपड़े प्रेस करने वाली मशीन है।
यह निर्जीव एक भौतिक वस्तु है।
दिन रात मेरे कपड़े प्रेस करती है
बदले में चार पैसे पा जाती है।
उसे निर्जीव भौतिक वस्तु को चेतना आ गई।
कपड़े पर स्त्री चलाना छोड़ दी।
कपड़े की चमक निकल गई।
बार-बार आजमाया तूने मेरी अस्मिता को।
यह तो एक नारी है।
इसकी परिभाषा तो बेचारी और लाचारी है।
वह पुरुष के बिना जी नहीं सकती।
सिंदूर ही उसका सुहाग है।
पुरुष ही उसका अभिमान है।
उसी से तो वह सोलह श्रृंगार करती है।
सजती और संवरती है ।
एक दिन उसे कुछ कटीले शब्द चुभ गए।
कोई निकलने वाला ना मिला।
उसके हृदय तर तर हो रहे थे।
वह अपने घाव भरने
स्त्री के आगोश में आ गया
बार-बार आजमाया तूने मेरी शक्ति को
मैं पुरुष हूं
मेरी भुजाओ में बहुत बाल है।
अरे एक नारी के बारे में तो सोच
मां ,मां के रूप में तुझे जन्म दे देती है।
फिर भी तुम उसकी शक्तियों से अपनी शक्तियों का आकलन करता है।
बार-बार आजमाया तूने मेरी धैर्य को
रात को जितनी चाहे जागू।
फिर भी भोर में ही उठ जाना है।
घर में झाड़ू देने वाली स्त्री की भूमिका निभानी है।
चूल्हे चौके की सफाई करके
रोटी अवश्य बनानी है।
धैर्य पूर्वक बना करवा पूरे परिवार को खिलाता है।
बार-बार आजमाया तूने मेरी साहस को।
तुम्हारी पत्नी होने से अधिक साहस की बात क्या है।
रोज लात घुसे खाकर भी तुम्हारे पास रहती है।
दिन रात तुम्हारे सलामती की दुआ मांगती है।
हर जन्म में तुझे मांगती है।
इससे बढ़कर और साहस क्या हो सकता है।
इसी तरह मेरी शक्ति मेरी साहस मेरी वजूद मेरी अस्मिता मेरे वजन को आजमाते रहे।
नहीं संभाल पाए तो फिर आप कर ही क्या सकते हैं।
बार-बार आजमाया और बार-बार हार गए।
हार मान लिया
आजमा कर छोड़ दिया
क्योंकि हमें आजमाना तेरे बस की बात नहीं।
स्वरचित
डॉ सरिता चौहान
गोरखपुर उत्तर प्रदेश

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