बीते दिनों की कहानी___ डॉ सरिता चौहान

औरत बनाम नारी जो भारत की शक्ति स्वरूपा की अंश मानी जाती हैं। लेकिन भारत में कुछ ऐसी भी नारी हैं जिनका हम जिक्र करने जा रहे हैं जिनके घमंड का तो कोई सीमा ही नहीं है। मैंने एक घमंडी और मगरूर औरत को आज दफ्तर आते ही देखा।
दफ्तर के ग्राउंड में एक बड़ा आम का विशाल वृक्ष है। उसे पेड़ से कुछ आम नीचे जमीन पर गिरे थे। धरती मां को कोई आपत्ति नहीं थी। वह खुश थीं और आम भी उनकी गोद में जैसे बिखरे पड़े विश्राम ले रहे थे। मैंने उन गिरे हुए आमों को उठा लिया। मेरे एक हाथ में पर्स और दूसरे हाथ में थैला और पेन थे। वह घमंडी और मगरूर औरत स्टाफ रूम के कॉर्नर वाली कुर्सी पर ही बैठतीं थीं। मैं उन गिरे हुए आमों को उठाकर टेबल पर रखा। आम रखते ही कहने लगीं हां- हां यहां मत रखिए बालू लग जाएगा। शायद उन आमों से भी वह गोरी थीं पर आम जितनी सुंदर नहीं। उस मगरूर औरत को यह नहीं दिखा कि मेरे दोनों हाथ थैले और कलम से भरे हैं। मैं बिना कुछ कहे बगल वाले स्टाफ रूम में चली गई। उनके कुर्सी से चौथी कुर्सी मेरी थी। मैं बिना विवाद किये बगल के स्टाफ रूम में चली गई। वहां स्टाफ रूम खचाखच भरा था पर उनमें से मैंने एक शिक्षिका को बुलाई। वह मेरे पेन पर्स में डाल दीं। हाथ से छाता लेकर बंद कर दीं और मेरा झोला उतार कर मुझे हल्का कीं। हाथ में जो चार आम थे मैंने वहीं बांट दिए। एक उन शिक्षिका के व्यवहार को देखिए और एक मगरूर औरत को देखिए जो कि नागरिक शास्त्र की शिक्षिका थीं, जिनके जिम्में अधिकार और नियम पढ़िने की जिम्मेदारी थी उनको देखिए। स्टाफ रूम के सामूहिक टेबल पर आम न रखने दीं और ना ही सहृदयता से मेरे थैले को पकड़ लिया। वह मुझसे दो साल सीनियर थीं पर मैं उनसे उम्र में 4 साल बड़ी। अब मेरा हाथ खाली हो चुका था और मैंने अपने टेबल पर अपना सामान रख लिया था। टेबल का वह हिस्सा जो उनके सामने था मैं वहां की जगह साफ कर दी। वह मन ही मन इतना प्रसन्न हो रहीं थीं कि जैसे उन्होंने मेरे पर हुकूमत चला कर कुछ राज सिंहासन प्राप्त कर लिया हो। टेबल ही तो साफ करना था सो मैंने कर दिया पर इतने पर भी उनका मन साफ नहीं हुआ। अपने हुकूमत के गुरुर से वह काफी प्रसन्न थी। उन्हें यह नहीं पता था कि मैंने उनके हुकूमत से टेबल नहीं साफ किया। मैंने तो इसलिए साफ किया कि शायद उनका मन साफ हो जाए। कॉलेज में इतनी हुकूमत शायद प्रधानाचार्य महोदया की नहीं चलती। चलती भी कैसे जब उन्हें चाटुकारिता की पुल बंधवाने की कोशिश उन लोगों से ही करवानी है। शायद उनकी जगह प्रधानाचार्य महोदय होती तो मैं इतनी भयभीत न होती जैसा कि उनके मन ने समझ लिया। लेकिन अधिकार और कानून पढ़ाने वाली इस शिक्षिका के सामने मैंने अपना मुंह नहीं खोला ,शायद मेरी बोलती बंद हो गई हो या ऐसा मेरा स्वभाव था। शायद उच्च अधिकारियों से उनके हाथ लंबे हो,
शायद प्रधानाचार्या भी इनसे इसी वजह से भयभीत रहती हों अथवा उनकी चाटुकारिता से प्रसन्न रहती हों
अथवा उनके पूरे ग्रुप का चाटुकारिता में सहयोग चाहती हों क्योंकि इन घमंडी लोगों का एक अलग ही ग्रुप है जिनको अपने ज्ञान और अपनी सुंदरता पर बहुत ही गुरुर है।
लेखिका —
डॉ सरिता चौहान




