धर्म का सार — पालजीभाई वी राठोड़ ‘प्रेम’

शास्त्रों में कहा गया है कि जो धारण करने योग्य है वहीं धर्म है धारयति इति धर्म:।धर्म का सार तत्व यही है कि जो कार्य हमको स्वयं के लिए बुरा लगता है वह कार्य हमें दूसरों के लिए कभी नही करना चाहिए। जिस व्यक्ति विशेष की भाषा एवं आचरण में अहंकार की भावना न के बराबर हो उस व्यक्ति की अहमियत हमारे समाज में सबसे अधिक होती है।गलती पीठ की तरह होती है औरों की दिखाई देती है अपनी नहीं आज कल देखा जाता है कि लोग एक दूसरे की कमियां बहुत जल्दी ढूंढ लेते हैं।चाहें हम में खुद में कितनी भी बुराइयां हों लेकिन हम हमेशा दूसरों की बुराइयों पर ही ध्यान देते हैं कि अमुक आदमी ऐसा है वो वैसा है। हमें नकारात्मक परिस्थितियों में भी सकारात्मक सोचना चाहिए और हमारी सकारात्मक सोच हमारी हर समस्याओ को हल करती है।अपने जीवन में सकारात्मकता बोलना शुरू करें।जैसे ही सोच बदलती है वैसे ही शब्द बदलते हैं और शब्दों से आपकी पूरी ज़िंदगी।जो हम सोचते हैं और बोलते हैं वही हमारी वास्तविकता बन जाती है।जब आप खुद से कहते हैं मैं सफल हूँ मैं खुश हूँ मैं योग्य हूँ तो आपका दिमाग इसे सच मानने लगता है और उसी दिशा में काम करता है।आपके शब्द एक ऊर्जा हैं अगर आप लगातार नकारात्मकता बोलेंगे तो वही आकर्षित करेंगे। लेकिन अगर आप अपने शब्दों से अपनी रियालिटी डिजाइन करेंगे तो सफलता,खुशी और प्यार आपकी ओर खिंचने लगेंगे। अपने विचारों को सकारात्मक रखकर चलना। राह में लाख नकारात्मकता आए पर डटे रहना करते रहना मदद औरों की तुम यूँ ही हरदम कभी उम्मीद की आश किसी से लगाए मत रखना। जीवन जितना सादा रहेगा तनाव उतना ही आधा रहेगा योग करे या ना करें पर जरूरत पड़ने पर एक दूसरे का सहयोग जरूर करें। लोग कहते है खाली हाथ आए हो और खाली हाथ जाओगे पर ऐसा नहीं है लोग भाग्य लेकर आते है और कर्म लेकर जाते है।कोई हमारी गलतीयां निकालता है तो हमें ख़ुश होना चाहिए क्योंकि कोई तो है जो हमें पूर्ण दोष रहित बनाने के लिए दोस्तों अपना दिमाग़ और समय दे रहा हैं।कहते हैं किसी की बातें तीर सी लगती हैं बातों को अपनी वाणी को वीणा के तार बनाइये वीणा के तार बजेंगे तो जीवन में मधुर संगीत होगा मधुरता आएगी और यदि बातों के तीर बनाये तो महाभारत को कोई नहीं रोक सकता तो मधुर बनिये। जीवन का सफर राह में जाने कितने मुसाफिर मिलेंगे कुछ अपने कुछ बेगाने मिलेंगे।एक सफर ही तो है जिंदगी जाने,कैसे कैसे लोग मिलेंगे,कभी खुशियों के तराने तो कभी गमों के फसाने मिलेंगे और अश्कों के संग केवल वीराने मिलेंगे। बहुत छोटी सी है यह जिंदगी सफर में नए नए तजुर्बे मिलेंगे। वहीं कार्य करें जो सबको अच्छा लगे सब के हित में हो।
गौरीनंदन श्री गणेश जी कर दो सबकी सहाए,
राग द्वेष सब दूर करो प्रभु सबको सब जन भाए।
सब ही सबके भाई बंधु हैं क्यों करे वैर निभाएं,
अपना अपना कमा रहे सब खुशी से मिलकर खाएं।
श्री पालजीभाई वी राठोड़ ‘प्रेम’ सुरेंद्रनगर गुजरात




