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लेखनी की अहमियत — कृत्या नंद झा अमृत

 

जब सत्तासीन अहंकारी पर लेखनी वार करती हैं
भ्रष्टाचार के खिलाफ उतर कर अफसरों का हाल लेती है
सत्ता परिवर्तन के लिए बेखौफ दिनरात चलती है
सबको समझ आती है तब लेखनी की अहमियत
जा अहंकारी का घमंड तोड़ने लेती है उनसे कैफ़ियत l

जा सोये वतन को जगाने लेखनी बेखौफ चलती है
निरीह जनता भी सड़कों पर जुल्म का प्रतिकार करती है
क्रांति के ज्वाला कलम से निकल कर स्वतंत्र भाव भरती है
तब तोप के गोले से बढ़कर समझ आती लेखनी की अहमियत
रक्तहीन क्रांति के लिए बिजली सी कौंधती है अनवरत l

जब न्याय के लिए लेखनी श्रृंगार करती है
सत्य को उजागर करने झूठ पर आघात करती है
भ्रष्टतंत्र के खिलाफ ईमान की राह चलती है
तब न्यायालय को समझ आती है लेखनी की अहमियत
जब कोई निर्दोष फांसी के फंदे के आता है निकल l

जब लेखनी चलती है तब विजयी संग्राम करती है
अहंकारी को झुकाती है निर्बलों को मुस्कान देती है
साहित्य संगीत रचती है देश का गुणगान करती है
तब कलम की अहमियत समझ में आती हैं
जब गुमनामी के अंधेरे से निकाल प्रतिभा का सम्मान करती है l

लेखनी खुद के लिए ना जीती है ना मरती है
बुराई को उजागर कर अच्छाई का पैग़ाम देती है
शोषित वंचित के उत्थान का आवाज़ बनती है
लेखनी की साहित्य को पता चलता है अहमियत
जब कोई साहित्यिक कृतित्व साहित्यकार को कर देता है अमर l

कृत्या नंद झा अमृत
राँची

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