क्या लिख दूं __डॉ सरिता चौहान

तेरी हथेली पर अपना नाम लिख दूं।
या तेरे दिल में अपना मकाम लिख दूं।
सूरज की लाली लिख दूं।
या बादल की स्याही लिख दूं।
या खुद को ही तेरे नाम कर दूं।
क्या कर दूं।
बोलो तो सही-
अपनी हर सुबह लिख दूं।
या ढलती हुई शाम लिख दूं।
या दिल के पैगाम तेरे नाम लिख दूं।
जीवन भर की कहानी लिख दूं।
या अनजानी सी एक पहचान लिख दूं
कलाम की स्याही लिख दूं।
यह कागज के पन्ने लिख दूं।
रोशनी भारी उजालों को लिख दूं।
क्या अंधेरी रात को लिख दूं।
क्या लिख दूं।
बोलो तो सही–
यह जिंदगी तेरे नाम लिख दूं।
या तेरे दिल में अपना मकाम लिख दूं।
बड़े महकमें रहने लगा है तू।
तेरे दिल की रोशनाई(स्याही )खत्म हो गई है।
मैं अपनी स्याही से तेरे दिल के हालात लिख दूं।
बोलो तो सही–
क्या लिख दूं।
तेरे हाथों में अपना नाम लिख दूं।
या तेरे दिल में अपना मकाम लिख दूं।
तुझसे मिलने आने के लिए अपना पैगाम लिख दूं।
क्या तुझसे दूर होने के जज्बात लिख दूं।
क्या लिख दूं
तेरे हाथों पर अपना नाम लिख दूं।
या तेरे दिल में अपना मकाम लिख दूं।
स्वरचित
डॉ सरिता चौहान
गोरखपुर उत्तर प्रदेश




