मां की यादें – जीवन की अनमोल पूंजी

यह लिखते हुए मेरी आंखें बार-बार भीग जाती हैं। मां… उनका नाम आते ही मन के आंगन में एक मधुर-सा संगीत बज उठता है। जीवन के हर मोड़ पर मां की ममता, त्याग और स्नेह का वह अदृश्य साया मेरे साथ रहा है। कितना कुछ सहा, कितना कुछ सहन किया उन्होंने, पर कभी शिकायत का स्वर उनके होंठों से नहीं निकला।
मां के साथ बिताए हुए पल आज भी दिल के सबसे करीब हैं। त्योहार हो या साधारण दिन, उनके चेहरे पर एक अलग-सी चमक होती थी। वह अपने हाथों से कुछ बनातीं और हमारी थाली में परोसतीं तो वही भोजन प्रसाद जैसा लगता। सादा पराठा, दाल-चावल या खिचड़ी भी मां के हाथों में स्वाद और आशीर्वाद का अद्भुत संगम बन जाते थे। शायद इसलिए कि उसमें उनके प्रेम की मिठास घुली होती थी।
समय अपनी रफ्तार से आगे बढ़ता गया। हम बड़े हो गए, अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त हो गए। मां धीरे-धीरे उम्र के उस मोड़ पर पहुँच गईं जहाँ शरीर की ताकत ढलने लगी, पर उनके चेहरे पर वही स्नेहिल मुस्कान बनी रही। थके हुए शरीर के बावजूद जब हम घर लौटते, तो मां के चेहरे पर तृप्ति का भाव होता—मानो हमारे लौट आने से ही उनकी थकान मिट जाती हो।
आज जब मेरा बेटा मेरी थाली में खाना परोसते हुए पूछता है, “मां, आपकी पसंद का खाना क्या है?”—तो मैं ठिठक जाती हूं। उस क्षण मुझे अपनी मां की वही आवाज़ सुनाई देती है—
“सबको खिलाना ही मेरी पसंद है।”
कितनी गहरी बात थी यह! तब शायद समझ नहीं पाई थी, पर आज जब मां के स्थान पर मैं खड़ी हूं, तो जानती हूं कि अपने अपनों को तृप्त होता देख जो संतोष मिलता है, वह किसी व्यंजन या स्वाद से कहीं बढ़कर है। मां की ‘पसंद’ वास्तव में परिवार का सुख था।
आज मां इस दुनिया में नहीं हैं, पर उनकी यादें, उनके संस्कार और उनकी दुआएं अब भी मेरे जीवन का संबल हैं। हर बार जब किसी कठिन परिस्थिति में हिम्मत टूटने लगती है, तो ऐसा लगता है मानो मां की दुआओं की रोटी भीतर से ताकत देती है। उनकी बनाई रसोई की महक अब भी स्मृतियों के आंगन में तैरती है।
मां, आप जहां भी हों, मैं जानती हूं, आपका स्नेह अब भी मेरे चारों ओर है। आपकी वह ममता, आपका त्याग, आपकी मुस्कान ही मेरे जीवन की सबसे कीमती पूंजी है।
आपकी बेटी।




