Uncategorized

मानवीय संवेदना — सुनीता तिवारी

 

सामने चबूतरे पर चारपाई बिछी थी, जिस पर सफेद चादर से ढका शव रखा था। घर के बाहर लोग इकट्ठे थे, लेकिन माहौल उतना गंभीर नहीं था जितना होना चाहिए।
कुछ औरतें धीरे-धीरे हँसते हुए इशारे कर रही थीं, कुछ पुरुष राजनीति और महँगाई पर चर्चा में व्यस्त थे।
किसी के हाथ में मोबाइल था तो कोई चाय की चुस्कियों के साथ गपशप कर रहा था।

केवल एक स्त्री
वह मृतक की पत्नी—बार-बार सिर पटक कर रो रही थी।
उसकी चीखें वातावरण को चीर रही थीं, परंतु आसपास बैठे लोग मानो उसे सुन ही नहीं रहे थे।
बच्चे जो बाहर नौकरी करते थे, अभी गाँव तक पहुँच नहीं पाए थे।

पड़ोसियों में से कुछ तो सिर्फ यह सोचकर आए थे कि नहीं जाएंगे तो आसपास वाले क्या कहेंगे।
किसी की नज़र संवेदना पर नहीं, बल्कि दिखावे पर थी।

एक वृद्ध पड़ोसी यह सब देख रहे थे उसने मन ही मन सोचा
कैसा समय आ गया है? पहले जब कोई जाता था तो पूरा गाँव शोक में डूब जाता था।
आज मृत्यु भी खबरों और मोबाइल स्टेटस का हिस्सा बनकर रह गई है।
इंसान के भीतर की करुणा, आपसी जुड़ाव
सब खत्म हो रहा है।

उसकी आँखें भर आईं, उसे लगा जैसे शव के साथ सिर्फ एक इंसान नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना भी इस दुनिया से विदा हो चुकी है।

सुनीता तिवारी

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!