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सड़क बनाम सत्ता: राहुल गांधी का सबसे बड़ा दांव । लोकेश झा

विश्वसनीयता की जंग—राहुल गांधी कहाँ खड़े हैं?

 

आज बिहार की राजनीति के केंद्र में राहुल गांधी हैं। उनकी वोटर अधिकार पदयात्रा और “वोट चोरी” का मुद्दा देशभर में चर्चा का विषय है। मैं मानता हूँ कि यह सिर्फ एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि लोकतंत्र और भरोसे की भी परीक्षा है।
राहुल गांधी का कहना है कि मतदाता सूची से गरीब, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों के नाम काटे जा रहे हैं। यह आरोप सुनने में गंभीर लगता है और जनता की भावनाओं को छूता भी है। लेकिन सवाल यह है कि जब चुनाव आयोग बार-बार इन दावों को झूठा बता रहा है, तो जनता किस पर भरोसा करेगी? मैंने देखा है कि उनकी पदयात्रा में भीड़ उमड़ रही है। युवा, महिलाएँ और अल्पसंख्यक वर्ग राहुल गांधी के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि इस यात्रा ने विपक्ष को जोड़ा है और कांग्रेस को सड़क पर जीवंत बनाया है। राहुल गांधी की छवि भीड़ में चलते हुए, हाथ मिलाते हुए और नारे लगाते हुए “जनता के नेता” जैसी लगती है।
लेकिन राजनीति भीड़ से नहीं, नतीजों से तय होती है। यह सच है कि पदयात्रा ने सुर्खियाँ बटोरी हैं, मगर अगर उनके आरोप ठोस सबूतों से साबित न हुए, तो यही मुद्दा उनकी साख को चोट भी पहुँचा सकता है। लोग कहेंगे— नेता तो सड़क पर निकले, लेकिन हाथ कुछ आया नहीं।
इसलिए मैं कहूँगा कि यह यात्रा राहुल गांधी के लिए दोधारी तलवार है। एक तरफ यह उन्हें “लोकतंत्र का प्रहरी” बनाकर नई ऊर्जा दे सकती है, तो दूसरी तरफ अगर आरोप खोखले साबित हुए, तो यह उनके राजनीतिक कैरियर पर सबसे बड़ा सवालिया निशान छोड़ सकती है।
राजनीति में अक्सर एक कदम किसी नेता की छवि बना भी देता है और बिगाड़ भी देता है। राहुल गांधी की यह पदयात्रा उसी मोड़ पर खड़ी है।
यह मेरे निजी विचार हैं, पाठक अपनी राय बनाने के लिए स्वतंत्र हैं।

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