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सुंदरी — लता शर्मा तृषा

 

मेरे पिता जी जानवर प्रेमी थे , हमारे घर में घोड़े ,बंदर,मगर, कुत्ता एवं विभिन्न प्रकार की चिड़िया भी थी उन्हीं सब जानवरों में एक नेवली भी थी मैंने उसका नाम सुंदरी रखा था वो दिन भर मेरे आस पास ही घुमती रहती मैं सोती तो नाक,कान, ठोड़ी को मुंह में पकड़ पकड़ कर शैतानी करती मुझे उससे बहुत लगाव था और उसे भी मुझसे।
जब मेरी शादी हुई तो अम्मा बताती थीं उसने तीन दिन खाना नहीं खाया सारे घर में दौड़ती फिरती मेरे कमरे बिस्तर को चुपचाप निहारते रहती खैर…

मैं मायके आई तो मुझसे मिलने मेरे चाचा की बेटी अपने साल भर के बेटे को लेकर आई बच्चे का जूता मोज़ा जैसे ही उसने उतारा सुंदरी बच्चे का मोज़ा लेकर आलमारी नीचे भाग गई मैंने उसे आवाज दी भी मेरी बहन परिस्थिति की मारी थी पता नहीं कैसे उसने बच्चे के लिए मोजे खरीदें थे उसका मुंह उतर गया उसे देख मैं सुंदरी को डांटते आलमारी नीचे हाथ डाल मोज़ा खींचने लगी सुंदरी बड़े गुस्से में अपना पूरा बाल फैलाकर मुझ पर पिल पड़ी फिर तो मैं जितना उछलती बचती वो उतने ही तेजी से उछल उछल मुझे इतना काटी की मेरा मुंह,पैर,हाथ खूना खून हो गया। मुझे भी गुस्सा बहुत आ रहा था उसे एक कसकर ड़ंड़ा लगाई वो नीचे बैठ गई दो दिन बिल्कुल शांत रही मैंने उसे बहुत दुलराया,पुचकारा दवा मलहम करी पर दो दिन बाद वह दुनिया से विदा हो गई मैं आज भी खुद को उस अपराध के लिए कोसती रहती हूं सुंदरी मेरे दिमाग में जिंदा है और मैं उसकी मौत की जिम्मेदार।
क्षमा करना मुझे सुंदरी आवेश में अपराध हो गया मुझसे, मैं बहन के आंखों की दीनता देख नहीं पाई और…।

लता शर्मा तृषा

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