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ये कैसी श्रद्धा — माया शर्मा

श्राद्ध पक्ष चल रहा था। दादी ने माँ से रात ही कह दिया था कि कल तुम्हारी दादी-सास का श्राद्ध है, इसलिए पंडिताईन को भोजन के लिए बुलाया है।
माँ सुबह से काम में जुटी थी। खीर, पूरी, जलेबी और कचौरी से रसोई महक रही थी।
मैंने माँ से कचौरी मांगी, तो दादी ने कहा,
“अरे बेटा, आज तेरी पर दादी का श्राद्ध है। पहले उन्हें भोग लगा दो, फिर तुम्हें खाने को मिलेगा।”
अबोध राघव बोला,
“दादी, क्या कचौरी और पकवान खाने के लिए मरना पड़ता है?”
घर में सबके मुँह बंद थे। कौन जवाब देता, कोई नहीं जानता था।
— माया शर्मा



