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जिजीविषा और जीवट के धनी दो साहित्यकारों की किताबें

उम्र के नब्बे पड़ाव पार कर अपने जीवट और सक्रियता से युवाओं को मात देने वाले देवरिया जनपद के समवयस्क दो साहित्यकारों की ताजा किताबें साहित्य की दुनिया में नई इबारत लिख रही हैं। इन पुस्तकों का लोकार्पण हिंदी दिवस चौदह सितंबर को समारोह के दौरान प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था नागरी प्रचारिणी सभा देवरिया के तुलसी सभागार में `नागरी रत्न` सम्मान से अलंकृत हैदराबाद के प्रो. एस. आर. सर्राजू, `नागरी भूषण` सम्मान से विभूषित इंदिरागांधी राष्ट्रीयजनजातीय वि. वि. अमरकंटक के पूर्व कुलपति प्रो.श्रीप्रकाश मणि त्रिपाठी तथा`नागरी श्री`से सम्मानित राष्ट्रीय स्तर के कवि श्री भूषण त्यागी के हाथों हुआ।
पहली पुस्तक प्रसिद्ध साहित्यकार ,अंचल भारती के संपादक और ना. प्र. सभा के अध्यक्ष डॉ जयनाथ मणि के निबंधों की पुस्तक`सृजन, समीक्षा और संवाद के बेलपत्र` अयन प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित है।इसमें डॉ मणि के तेईस निबंध , संस्मरणात्मक आलेख और
समीक्षाएं संकलित हैं।डॉ मणि न केवल विवेकशील संपादक और संवेदनशील कवि ,कथाकार हैं वरन नीर क्षीर विवेकी समीक्षक भी हैं।
सृजन की विविध विधाओं में उनका रचना कौशल मुखरित हुआ है।` स्मृति के झरोखे से: परिवेश परिक्रमा`
में अपने भोजपुरी अंचल की भाषा और संस्कृति से प्यार करनेवाले लोकप्रिय जिलाधिकारी मिथिलांचल के सपूत सुबोधनाथ झा के देवरिया पदस्थापन काल के रोचक संस्मरणों को संजोया है।`स्वतंत्रता पुकारती` में
आजादी के आत्मकथ्य और पीड़ा को स्वर दिया है।`आ गया अजाने देश में`कवि मन
बरसात के एक दिन को कविताओं और गीतों के रस में भीगते हुए स्वप्न लोक की सैर कर आता है। `पारिजाता देवी` निबंध में बाराबंकी जिले के किन्तुर कस्बे में स्थित पारिजात वृक्ष के संबंध में रोचक पौराणिक कथा का वर्णन है।`अबीर लगो दरकन`में वसंत के विविध रंगों की छटा है।
लोधररज निबंध में स्त्री पुरुष श्रृंगार प्रसाधन के पारंपरिक
,पाउडर जो लोध नामक वनस्पति से बनाया जाता था
का उल्लेख है।इसी प्रकार
पूर्वी लोक गीतों में रामचरित,
1857स्वतंत्रता संग्राम और पूर्वी उत्तर प्रदेश, छाया वादी काव्य प्रवृत्तियां,रविन्द्र नाथ टैगोर और गीतांजलि, अनुवाद ,समस्याएं और समाधान, भोजपुरी साहित्य की त्रिवेणी आदि अन्य
विचारात्मक निबंध संकलित हैं जो पुस्तक को महत्वपूर्ण
बनाते हैं जिनमें लेखक की चिंतन दृष्टि, विश्लेषणात्मक
क्षमता और परिवेश के प्रति
सजग अंतर्दृष्टि का बोध मुखरित हुआ है।
दूसरी पुस्तक मन~ मिजाज से चिरयुवा कवि गीतकार गिरधर करुण जी का काव्य संकलन`कोरे कागज के आखर`है जिसमें
गीत,नव गीत, मुक्त छंद की कविताएं, ग़ज़लें मुक्तक तथा कुछ भोजपुरी गीत संकलित हैं,जो कवि के बहु आयामी काव्य व्यक्तित्व के परिचायक हैं।वैसे तो कवि `करुण `जी
अपने नामानुरूप संयोग और विरह श्रृंगार गीतों के स्वर~ साधक, मधुर गायक रहे हैं
जिनमें प्रेम की चुभन, करुणा पीड़ा,दंश ,कशिश ,लयात्मकता और सरसता के तत्व समाहित हैं,पर उनकी छंद मुक्त रचनाओं में सामाजिक विद्रूपताओं और विसंगतियों
पर करारा व्यंग्य, आलोचना, व्यंजना और प्रतिरोध के स्वर भी मुखरित हुए हैं।उनकी भोजपुरी और हिंदी गीतों में लोक रस~ रंग का परिपाक
देखते ही बनता है। नवगीतों
में जहां अभिनव देशज बिंब और प्रतीकों का प्रचुर प्रयोग दिखता है वहीं उनकी बुनावट में कल्पना की इंद्रधनुषी आभा भी प्रतिबिंबित होती है। भाषाई शिल्प में भाव~ सौंदर्य का टटकापन और नवाचार करुण जी के गीतों में जहां सागर की गहराई भरते हैं वहीं उनका चिंतन क्षितिज आकाश की ऊंचाई
का आभास कराता है। कवि के दो काव्य संग्रह मन का हिरना और बात क्या है? इससे पूर्व आ चुके हैं ,यह उनका तीसरा संग्रह है , आशा है यह उनके जीवन की सांध्य बेला में भरपूर यश और प्रसिद्धि देगा जिसके वे
हकदार हैं।नए संग्रह से कुछ झलकियां द्रष्टव्य हैं~
भोजपुरी चइता ~
अंगुरी में गिनती के पोर
बारिश दिन कइसे गिनाई।।
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छलक रही गंधों की गागरी
घर आंगन गांव महकने लगे
संयम का बांध लगा टूटने
हर खिड़की पंथ लगी झांकने
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मैं शहर से दूरदना गांव होकर रह गया हूं
दर्द के सैलाब माणिक नाव होकर रह गया हूँ।
कुछ कहा जाता नहीं है
चुप रहा जाता नहीं है।।
हो गया है पेड़ धोधड़
खुद ढहा जाता नहीं है।।
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`कोरे कागज के आखर`
के
अक्षर अक्षर में एक हुलास है/
तडपन है, और है पसरी यादों का एक जंगल/आइए इसकी
उलझी गांठों को खोलें/
दिखाएं ऐ हल्का हो लें
°°°°°°°°
एक गजल का मतला~~
आज तक कुछ नहीं किया मैने
जिंदगी का जहर पिया मैने।।
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एक छंद मुक्त कविता की कुछ पंक्तियाँ ~~~
मेरा घर निहोरा करता है/
नहाने के लिए/ खाने के लिए/घर की टूटी चारपाई
बुलाती है सोने के लिए/
फिर दांत चियार कर विरोध करती है/ जगह बेजगह फटी हुई रजाई/लोरी सुनने सुनने के लिए

नव गीत के कुछ बिंब~~~
गूंगी हुई हवाएं और दिशाएं बहरी हांफ रही है पाकड़ पर अधमरी गिलहरी
मेड डांड पर सुस्ताता है दिन का कछुआ
खरहा सी संध्या को हॉक रही है पछुआ
आंखेमें सुई सी भती दोपहरी।।
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राजनीति पर एक व्यंग्य मुक्तक~~
छोटी होती लंबे पेड़ों की परछाई
जिनके जड़ में जम जाती जड़ता की खाई
वंशवाद की महफिल में बदर का जमघट
दादुर बजा रहे हैं स्वागत में
शहनाई।
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अमर शहीदों के समाधि पर बुझते दीप जलाओ
ओ दरबारी गाने वाले दीपक राग सुनाओ।।
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`कोरे कागज के आखर`
सर्व भाषा प्रकाशन नई दिल्ली से प्रकाशित है।
बेहद पठनीय और संग्रहणीय
दोनों साहित्यकारों को स्वस्थ सक्रिय जीवन एवं उनके दीर्घायुष्य के लिए अशेष शुभकामनाएं।
इंद्रकुमार दीक्षित ,देवरिया।

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