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कुछ अधूरे से हम — रिया मनोज

 

कुछ अधूरे हम, कुछ अधूरी ज़िन्दगी,
इतनी ख़्वाहिशें… इतनी नाराज़गियाँ।
सब कुछ दिया भगवान ने,
फिर भी हसरतें अधूरी ही रहीं।

उससे मुलाक़ात एक अरसे बाद हुई —
वो अब भी वैसे ही मुस्कुराती है,
जैसे बचपन में मुस्कुराती थी।
न वो सुन पाती है, न बोल पाती है,
फिर भी सब समझ जाती है,
सब कह जाती है…
हँसा देती है, छेड़ जाती है।

उससे मिलकर ये एहसास हुआ —
ज़िन्दगी आसान भी हो सकती है,
अगर जीने का अंदाज़ आता हो।
हमें मिला हर सुख, हर सिंगार,
भगवान ने हमें सर्वगुण संपन्न रखा —
फिर भी शिकायतें रहीं…
और वो —
जो अपनी ख़ामोशी में भी मुकम्मल रही,
जिसने सिखाया कि ज़िन्दगी गूंजती है वहाँ भी,
जहाँ आवाज़ नहीं होती।
रिया मनोज
जयपुर(राजस्थान)

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