“मां की अंतिम चाह” — शालिनी शर्मा

आजकल की व्यस्त और भागदौड़ भरी जिंदगी में बच्चों के पास अपनी मां के लिए समय नहीं रह गया है। व्यापारी दुनिया, पैसा और कामयाबी की चमक-दमक ने उन्हें इतना घेर लिया है कि जिसने उन्हें जन्म दिया, पाला-पोसा, उसके लिए दो पल भी निकालना कठिन हो गया है।
मां का जीवन अपने बच्चों के इर्द-गिर्द ही घूमता है। वह अपने सपनों, इच्छाओं और आराम का बलिदान कर देती है ताकि उसका बेटा जीवन में ऊँचाइयों को छू सके। लेकिन विडंबना यह है कि जब मां बुढ़ापे में पहुंचती है, जब उसका शरीर साथ नहीं देता, तब वही बेटा अपनी जिम्मेदारियों और दुनिया की चकाचौंध में इतना खो जाता है कि मां का अकेलापन उसे दिखाई ही नहीं देता।
अंतिम समय में मां को किसी दौलत, सोने-चांदी, या बड़े मकान की जरूरत नहीं होती। उसकी केवल एक ही इच्छा होती है—कि उसका बेटा उसके पास बैठे, उसका हाथ थामे, और उसे यह अहसास दिलाए कि वह अकेली नहीं है। मां चाहती है कि उसकी अंतिम सांसें उस आंचल के तले बीतें, जिसे उसने जीवनभर अपने बेटे की परवरिश में समर्पित किया।
मां का दर्द यह है कि वह देखती है उसका बेटा मोबाइल, कारोबार, दोस्तों और मीटिंग्स में व्यस्त है, जबकि उसकी आंखें दरवाजे पर टिकी रहती हैं—शायद आज बेटा समय निकाले और पास आकर दो बातें कर ले। वह चाहती है कि बेटा उसके सफेद होते बालों को सहलाए, उसकी थकी आंखों को सुकून दे, और उसे यह विश्वास दिलाए कि उसका साथ आखिरी सांस तक रहेगा।
एक बेटे के लिए मां का यह साथ निभाना सिर्फ कर्तव्य नहीं, बल्कि सबसे बड़ा धर्म है। क्योंकि मां के आशीर्वाद से बढ़कर इस दुनिया में कोई दौलत नहीं।
शालिनी शर्मा
रूद्रपुर उत्तराखंड




