वजूद अरावली पर्वत माला का — डॉ- डिम्पल सैनी

मोतियों की तरह में भी श्रंखला में खडी़ हूँ,
हाँ, मैं अरावली पर्वत माला हूँ।
अति प्राचीन युगों युग देखे मैंने,
सदियों से खड़े होकर इस धरा को सुशोभित किया ।
हाँ, मैं अरावली पर्वत माला हूँ।
जो गुजरात से राजस्थान और हरियाणा से दिल्ली तक विस्तृत फैली हुई।
हाँ, मैं अरावली पर्वत माला हूँ।
अरावली का सबसे ऊँचा पर्वत गुरु शिखर पर्वत (1722 मीटर ) को तो सब जानते ही हैं।
छोटी पहाडियां वन्यजीवों की आश्रय स्थली। कैर सांगरी छोटी बड़ी बेरियों की मिठास अरावली से ही तो है।
बनास, लूनी, साबरमती,साहिबी,बेराच कितनी ही नदियाँ जिनका उदगम अरावली तो हैं।
कच्छ के रण, थार के रेतिले टीबे, और राजस्थान के निहारने के किले व महल यही तो है।
हाँ, मैं अरावली पर्वत माला हूँ। बहलोल खान को घोड़े सहित चीर दिया था वीर महाराणा प्रताप ने, अमर सिंह ने भाले के एक ही वार से सुलतान खान को यमलोक पंहुचा दिया था,जौहर रानी पद्मावती का 16000 रानियों और वीर क्षत्राणियों के साथ और भी कितनी ही शौर्य गाथाएं और वीरत्व को जन्म दिया इसी अरावली ने कितना रक्त बहा इस बलिदानी परम्परा के निर्वहन में।
हाँ, मैं अरावली पर्वत माला हूँ।
भू क्षरण रोकने व भूजल संरक्षण और वन्य जीव आवास में मेरी भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है ये सब जानते हैं।
हाँ मैं अरावली पर्वत माला हूँ।
किन्तु आज सुप्रीम कोर्ट के आदेश से मेरा समूचा (90%)वजूद ही नष्ट समझो। मेरा तो इतिहास ही बन जायेगा। अगली पीढ़ी देखना शायद मेरे नसीब में नहीं।
शायद अब इस धरा की रक्षा नहीं कर पाऊँगी।
हाँ, मैं अब अरावली पर्वत माला नहीं कहला पाऊँगी।
डॉ- डिम्पल सैनी




