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बचपन और दिवाली – छोटी खुशियों का बड़ा उजाला — मंजू शर्मा

 

बचपन का समय सचमुच कितना प्यारा, कितना सुन्दर और कितना ही अनमोल था। उस वक़्त खुशियाँ बड़ी चीज़ों में नहीं, बल्कि बहुत ही छोटे-छोटे पलों और उपहारों में छुपी रहती थी। गली के पेड़ों पर झूले पड़ते, हम पींग बढ़ाकर आसमान छूने की कोशिश करते। खेलों में गट्टे, लंगड़ी, खो-खो, पिट्ठू – इन सबमें ही हमारी दुनिया बस जाती थी। हर त्योहार की अपनी ही रोनक होती थी।

पर असली जादू तो दिवाली के त्योहार में होता था।
घर-आँगन में मिट्टी के दीयों की कतारें जगमगातीं, माँ हाथों से रंगोली बनाती, और हम बच्चे बेसब्री से इंतज़ार करते उन छोटे-छोटे पटाखों का, जो हमारी सबसे बड़ी खुशियाँ थे।

एक फुलझड़ी हाथ में पकड़ लेते तो लगता मानो पूरी रात हमारी मुट्ठी में क़ैद हो गई है।
चकरी घूमती तो हम सब ताली बजाकर उछल पड़ते।
‘साँप-गोली’ की डिब्बी मिल जाती थी तो नाच उठते थे। उसमें से निकली छोटी-सी काली लकीर हमें जादू जैसी लगती।
पटाखे भले ही गिनती के होते थे, मगर हँसी बेहिसाब होती थी।
पहले कपड़े और छोटे-छोटे पत्थरों से बने पटाखे होते थे जिसे गोड़ी बाण कहते थे।छत पर खड़े होकर दीवार पर फेंकते थे तो धरती हिल जाती थी। गांव के एक चाचा बनाते थे सबके घरों से पुराने कपड़े ले जाकर और दिवाली के कुछ दिन पहले दे जाते थे।
उस समय हमारे लिए एक छोटी अनार की चमक ही आसमान के रॉकेट से कम नहीं थी। माचिस की तीली जैसे ही जलती, आँखों में दीयों से भी ज़्यादा चमक आ जाती। थोड़े में ही पूरा संसार समा जाता था। कितने खुशहाल थे वह दिन न चिंता, न फ्रिक्र, न बस्तों का बोझ,न पढ़ाई का लोड…बस आनन्द ही आनन्द। वो भी क्या बचपन था जिसमें खेल कूद से शरीर का विकास होता था। हड्डियों को मजबूती मिलती थी। बहन भाईयों में नोंक-झोंक के साथ प्रेम बढ़ता था। आजकल अकेले बच्चे क्या करें। सुख-सुविधाओं की कमी नहीं रखते माता-पिता फिर भी खुश नहीं क्योंकि उसे खुशी का महत्व ही नहीं पता…
समय ने बड़ी तेजी से करवट ली है।
आज जब हम दिवाली देखते हैं, तो तस्वीर बदल चुकी है। आज के बच्चों को छोटे पटाखों में मज़ा नहीं आता। उनकी ख़ुशियाँ बड़े-बड़े रॉकेटों, हज़ारों पटाखों और कानफोड़ू धमाकों से बंधी दिखती हैं। फिर भी, उनके चेहरों पर वो मासूम हँसी नहीं दिखती जो कभी हमारी आँखों में चमक बनकर झलकती थी। बचपन की वो दिवाली,जब थोड़े में ही बहुत था,जब छोटी-सी फुलझड़ी में पूरा आसमान समा जाता था,आज भी यादों में सबसे जगमगाती रहती है।सचमुच—वो बचपन ही तो था जहाँ सच में हर त्योहार, हर पल,अनमोल लगता था।काश, आज की पीढ़ी भी समझ पाए कि असली दिवाली पटाखों की आवाज़ और रॉकेट की चमक में नहीं, बल्कि दीयों की शांत लौ, रिश्तों की मिठास और मासूम मुस्कुराहट में बसती है। वही छोटी-सी रोशनी, जो कभी हमारे बचपन को जगमगाती थी, वही आज भी दिलों को रोशन करने का असली सामर्थ्य रखती है।” बस थोड़ा पीछे मुड़ने की जरूरत है।

मंजू शर्मा ‘मनस्विनी’
कार्यकारी संपादक

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