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बचपन की दीपावली — अमृत बिसारिया

 

बचपन की दिवाली जीवन की सबसे मधुर यादों का त्योहार है। त्योहार से कई दिन पहले ही घर में साफ़-सफ़ाई का दौर शुरू हो जाता था। माँ हर कोने को चमका देतीं, अलमारियाँ सलीके से सजतीं और हम बच्चे भी माँ के कम में हाथ बटाते थे, दीवारों पर रंगोली के निशान बना देते।
आँगन में मिट्टी के नए दीये धुले-सजे रखे होते, जिन पर तेल और बाती डालने की ज़िम्मेदारी मेरी होती। शाम को पूरा घर दीपमालाओं से जगमग हो उठता। पूजा के समय माँ पिता जी के साथ हम सभी मिल कर लक्ष्मी–गणेश की आरती गाते और हाथ जोड़कर मन से प्रार्थना करते कि घर में सुख-समृद्धि बनी रहे।

पूजा के बाद प्रसाद, मिठाइयों और फुलझड़ियों की चमक से वातावरण आनंदमय हो जाता। वह दिवाली सिर्फ़ रोशनी का नहीं, अपनत्व और सादगी का उत्सव थी—जहाँ खुशियाँ कम साधनों में भी भरपूर महसूस होती थीं।

दिवाली की शाम लक्ष्मी–गणेश पूजा के बाद प्रसाद चढ़ाने का बड़ा आनंद होता था। माँ थाली में खील, बताशे, मिठाइयाँ और सूखे मेवे सजातीं, फिर दीपक जलाकर श्रद्धा से प्रसाद अर्पित करतीं। पूजा के बाद वही प्रसाद सबमें बाँटा जाता—पहले बड़ों को, फिर बच्चों को। इससे संस्कारों का भी लेंन देन होता था।

घर में तरह-तरह के पकवानों की सुगंध फैल जाती—गुझिया, नमकपारे, शक्करपारे, चकली, पूरियाँ, दहीबड़े और आलू की सब्ज़ी। पड़ोसी भी थालियों में मिठाइयाँ लेकर आते-जाते। उस बाँटने-बाँटने में एक विशेष अपनापन था, मानो स्वाद ही नहीं, स्नेह और शुभकामनाएँ भी एक-दूसरे तक पहुँच रही हों।

दिवाली की रात पटाखों और फुलझड़ियों की चमक से आसमान जगमग हो उठता। बच्चे हँसी-खुशी से फुलझड़ी जलाते, अनार और चकरी के रंगीन नज़ारे देखते। कानों में गूँजती आवाज़ें और रोशनी का उत्सव, जैसे हर दिल में खुशियों की आतिशबाज़ी फूट रही हो।परंतु हमारे बचपन में इतनी आतिशबाजी नहीं थी जिससे पॉल्यूशन का ख़तरा बनें।

दीपावली प्रकाश, आनंद और समृद्धि का त्योहार है। यह अंधकार पर प्रकाश, असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक है।

अमृत बिसारिया
दुबई

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