दशहरा — हरीश शर्मा “श्याम” की कलम से

दशहरे का दिन था।
आज हमारी सोसाइटी में कुछ ज्यादा ही चहल-पहल थी। वैसे तो हमारी सोसाइटी में सभी त्यौहार बड़ी ही धूम-धाम से मनाये जाते हैं लेकिन आज रावण दहन होना था इसलिये कुछ ज्यादा ही रौनक थी।
बच्चे कुछ ज्यादा ही उत्साहित थे रावण दहन को लेकर। लेकिन पता नहीं क्यूं श्याम का मन कहीं अलग ही भटक रहा था, वह सोच रहा था कि हर वर्ष हम बड़ी धूम-धाम से बुराई के प्रतीक इस रावण के पुतले को जलाकर खुश होते हैं लेकिन क्या सच में आज हम इस समाज से बुराई रूपी रावण को जला पाए? या कभी हमने कोशिश भी की समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, बेईमानी, घूसखोरी और न जाने ऐसी कितनी ही बुराइयों को जड़ से ख़त्म करने की?
हम बात तो करते हैं कि ये समाज कब सुधरेगा कब ये भ्रष्टाचार,बेईमानी जैसी बुराइयाँ जड़ से ख़त्म होंगी लेकिन हम ये भूल जाते हैं कि इन को बढ़ाने वाला कोई और नहीं हम ही हैं। अगर हम में से कोई भी शुरआत करे तो क्या हम इस बुराई को ख़त्म नहीं कर सकते?
लेकिन आज हम एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ में इस कदर डूबे हुए हैँ कि सब कुछ जानते हुए भी यही सोच कर शांत हो जाते हैं कि और कोई कुछ नहीं कर रहा तो हमको ही क्या करना।
श्याम इन विचारों में इतना खो गया कि दरवाजे की घंटी की आवाज़ पर भी उसका ध्यान काफी देर में गया। उसने उठकर दरवाजा खोला तो सामने पड़ोस वाले चड्ढा जी खड़े थे उसे देखते हो बोले… अरे भाई श्याम जी कहाँ खो गये थे कब से आपको आवाज़ दे रहा हूँ, रावण दहन के कार्यक्रम में नहीं चलना। उसने कहा आप चलिए मैं बस दो मिनट में आता हूँ।
थोड़ी देर बाद जब श्याम नीचे सोसाइटी कंपाउंड में पहुँचा तो देखा कि बड़े ही भव्य तरीके से रावण दहन की तैयारी की गयी थी। पूरी सोसाइटी में रौशनी की गयी थी, एक तरफ खाने पीने का भी इंतज़ाम किया गया था और बीच में लगभग 50 फुट ऊँचा रावण का पुतला खड़ा हुआ था। सभी लोग तैयार होकर खड़े आपस में बातें करने में मशगूल थे और बच्चे तो बस इस इंतज़ार में थे कि कब रावण दहन हो।
थोड़ी देर में ही रावण का पुतला धूं धूं कर के जल गया और पूरा आसमान आतिशबाजी से जगमगा उठा। बच्चे बड़े सभी रावण दहन का आनंद ले रहे थे और वह अब भी यही सोच रहा था कि हम बुराई के प्रतीक इस रावण के दहन की तरह ही समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार और कुरीतिओं को जड़ से ख़त्म करने का बीड़ा उठा ले तो रामराज्य जैसी शुरुआत तो कर ही सकते है।
स्वरचित
हरीश शर्मा “श्याम”
मथुरा (उ. प्र.)।




